Archive for December, 2008

वैद्य अमीर खुसरो

अमीर खुसरो जी को साहित्यकार, राजनीतिज्ञ और सूफी संत के बारे में सभी जानते है. आज प्रस्तुत है अमीर खुसरो का वैद्य रूप.

गीत, पहेलियाँ, मुकरिया तो उनके प्रसिद्द है ही, आज प्रस्तुत है चंद ऐसे दोहे जिसमें घरेलु नुस्के है -

त्रि कटा त्रिफला, पांचो नमक पतंग
दांत बंजर हो जात है मांज लो फल के संग

हरडा बहेडा आंवला तीनो नॉन पतंग
दांत बंजर सो होत है मांजू फल के संग

प्रात काल खाट से उठ के तुरत पीए जो पानी
वा घर वैद्य कबहू न जावे बात खुसरो ने जानी

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रूपसी उर्वशी

सुप्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर का यह जन्म शताब्दी वर्ष है।

दिनकर अपनी ओजस्वी कविताओं के लिए प्रसिद्ध रहे। भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्र कवि की उपाधि भी दी। उन्हीं की कलम का एक दूसरा रूप प्रस्तुत है, उनके काव्य ग्रन्थ उर्वशी से उर्वशी के रूप सौन्दर्य को चित्रित करती चन्द पंक्तियाँ -

एक मूर्ति में सिमट गई किस भाँति सिद्धियाँ सारी ?
कब था ज्ञात मुझे इतनी सुन्दर होती है नारी ?

लाल लाल वे चरण कमल से, कुंकुम से, जावक से,
तन की रक्तिम कांति युद्ध ज्यों धुली हुई पावक से।

जग भर की माधुरी अरूण अधरों में धरी हुई सी
आँखों में वारूणी रंग, निद्रा कुछ भरी हुई सी।

तन प्रकांति मुकुलित, अनंत ऊषाओं की लाली सी
नूतनता संपूर्ण जगत की, संचित हरियाली सी।

पग पड़ते ही फूट पड़े विद्रूम प्रवाल धूलों से
जहाँ खड़ी हो वहीं व्योम भर जाए श्वेत फूलों से।

दर्पण जिसमें प्रकृति रूप अपना देखा करती है
वह सौन्दर्य, कला जिसका सपना देखा करती है।

नहीं, उर्वशी नारी नहीं, आभा है निखिल भुवन की
रूप नहीं, निष्कलुष कल्पना है सृष्टा के मन की।

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राणा प्रताप

आजकल कविताओं में वीर रस बहुत ही कम या कहे ग़ायब ही हो गया है।

वीर रस की रचनाओं को पढने का अपना एक अलग ही आनन्द होता है। पूरी शौर्य गाथा एक लम्बी रचना में समा जाती है। एक ऐसी ही रचना प्रस्तुत है। कवि है हिन्दी के जाने माने कवि श्याम नारायण पाण्डेय -

राणा प्रताप की तलवार

चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
रखता था भूतल पानी को।
राणा प्रताप सिर काट काट,
करता था सफल जवानी को॥

कलकल बहती थी रणगंगा,
अरिदल को डूब नहाने को।
तलवार वीर की नाव बनी,
चटपट उस पार लगाने को॥

वैरी दल को ललकार गिरी,
वह नागिन सी फुफकार गिरी।
था शोर मौत से बचो बचो,
तलवार गिरी तलवार गिरी॥

पैदल, हयदल, गजदल में,
छप छप करती वह निकल गई।
क्षण कहाँ गई कुछ पता न फिर,
देखो चम-चम वह निकल गई॥

क्षण इधर गई क्षण उधर गई,
क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई।
था प्रलय चमकती जिधर गई,
क्षण शोर हो गया किधर गई॥

लहराती थी सिर काट काट,
बलखाती थी भू पाट पाट।
बिखराती अवयव बाट बाट,
तनती थी लोहू चाट चाट॥

क्षण भीषण हलचल मचा मचा,
राणा कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह,
रण-चंडी जीभ पसार बढ़ी॥

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