Archive for October, 2008

भद्रकाली मन्दिर

आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ !

दीपावली का पर्व एकादशी से शुरू होता है और पाँचवें दिन होती है दीपावली। इन सभी पवित्र दिनों के लिए कई कथाएँ प्रचलित है और उसी के अनुसार लक्ष्मी गणेश के पूजन के अलावा अन्य देवी-देवता भी पूजे जाते है। कई स्थानों पर भद्रकाली की पूजा की जाती है।

आज हम आपको ले चलते है आन्ध्र प्रदेश के वरंगल ज़िले के प्रसिद्ध हज़ार स्तम्भ के मन्दिर के पास ही स्थित भद्रकाली मन्दिर में जहाँ हम पिछले वर्ष गए थे।

प्रवेश करते ही दाहिनी ओर छोटे से पहाड़ के ऊपर स्थित है शिव पार्वती की विशाल मूर्तियाँ -

परिसर में सामने मन्दिर कलश पर स्थित है जगदम्बा की मूर्ति -

ऐसी ही विशाल मूर्ति मन्दिर मे स्थापित है। यह मुख्य मन्दिर का पीछे का भाग है।

यह मन्दिर बड़े तालाब के किनारे स्थित होने से बहुत आकर्षक है। परिसर में प्रवेश करते ही बाईं ओर से स्वच्छ तालाब के किनारे का आनन्द लेते हुए हम आगे बढते गए।

आगे दाहिनी ओर है मन्दिर जो तालाब के किनारे है -

दाहिनी ओर बड़ा सा कक्ष है मुख्य मन्दिर का जिसमें बाईं ओर छोटे-छोटे मन्दिरों में गणपति और शिवलिंग है। एकदम सामने है जगदम्बा माता की विशाल मूर्ति।

मन्दिर की दीवारों और स्तम्भों पर माँ के विभिन्न रूपों की कलाकृतियाँ है।

मन्दिर में दर्शन कर हम बाहर आए और तालाब के इस सुन्दर किनारे के साथ-साथ पीछे की ओर बढते गए। पीछे है सुन्दर बगीचा -

और बगीचे के अंतिम किनारे पर स्थापित है शिवलिंग -

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जैन मन्दिर

दीपावली आ रही है। साथ में ला रही है कई कथाएँ।

दीपावली और उसके आस-पास के दिन विभिन्न समुदायों में विभिन्न कारणों से विभिन्न स्वरूप में मनाए जाते है। दीपावली का दिन भगवान महावीर के महानिर्माण दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन जैन मन्दिरों में विशेष पूजा अर्चना की जाती है।

आन्ध्र प्रदेश में नलगोण्डा ज़िले के बाद है वरंगल और इन दोनों के बीच में है जैन मन्दिर जो हैदराबाद से लगभग तीन घण्टे की दूरी पर है।

मन्दिर की बनावट बहुत ही सुन्दर है। इस द्वार से हमने मन्दिर के प्रांगण में प्रवेश किया -

यह है मन्दिर का प्रवेश द्वार -

प्रवेश द्वार के दोनों ओर ऐरावत है जिस पर शायद महाराज अग्रसेन विराजमान है -

इन मूर्तियों को जिन्होनें बनवाया उनके नाम और पते इन मूर्तियों पर खुदे है। यहाँ से प्रवेश करने पर भीतर मन्दिर का बड़ा कक्ष है जिसमें सामने बीचों-बीच भगवान महावीर की विशाल मूर्ति है।

दोनों ओर की दीवारों से सटी भगवान महावीर के विभिन्न रूपों की मूर्तियाँ है। साथ ही श्लोक भी है जिनसे विभिन्न कथाओं और घटनाओं का पता चलता है।

इस मन्दिर में सवेरे सूर्योदय और शाम में सूर्यास्त पर आरती होती है जिसके अलावा दिन में 11 बजे और दोपहर बाद भी आरती होती है।

हम दिन में 11 बजे की आरती के समय पहुँचे। भीड़ नहीं थी। बहुत कम लोग थे। हम सोच रहे थे जिस तरह आमतौर पर मन्दिरों में आरती होती है वैसे ही होगी यह आरती भी हालांकि हमें कुछ अटपटा सा लगा कि 11 बजे के समय आरती होती है।

ख़ैर… दर्शन तो हमने कर लिए थे और हम वहाँ से निकलना चाहते थे क्योंकि हमें वरंगल जाना था पर एक महाशय ने हमें रोक लिया, कहा कि अभी आरती शुरू होगी, आरती में शामिल हो जाइए। हम सोचने लगे कि यह महाशय हमें क्यों रोक रहे है फिर शिष्टाचार के नाते हम रूक गए।

फिर हमने देखा पंडित जी ने हाथ में माइक लिया और कुछ कहा शायद आरती शुरू करने की बात कही। हमें लगा शायद पंडित जी माइक पर आरती गाते होंगे लेकिन और कोई पुरोहित हमें नज़र नहीं आया जो आरती कर सके।

तभी हमने सुना पंडित जी माइक पर कुछ बोलने लगे फिर यह महाशय जिन्होनें हमे रोका था, कुछ कहने लगे जिसके बाद कक्ष में बैठे भक्तगण भी कुछ कहने लगे। हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है।

फिर ध्यान से सुना किसी ने कहा पचास पण फिर किसी ने कहा सत्तर पण। अरे पण का मतलब तो रूपया होता है… फिर उस महाशय ने कहा ढाई सौ पण जिसके बाद सभी चुप हो गए। पंडित जी ने कहा ढाई सौ पण एक, ढाई सौ पण दो, ढाई सौ पण तीन फिर चुप्पी छा गई।

इसके बाद पंडित जी ने रजिस्टर खोला और उसमें उस महाशय का नाम, पता और शायद गोत्र आदि लिखने लगे। तब हमें लगा कि यह महाशय आरती के लिए हमें क्यों रोक रहे थे। शायद इन्हें पूरा विश्वास था कि यह आरती सबसे ऊँची बोली लगाकर यह अपने नाम कर ही लेगें।

हमारा तो यह बिल्कुल ही पहला अनुभव था। हम नहीं जानते कि आरती की यह प्रथा क्यों है ? अगर कोई बताना चाहे तो बताएं।

आरती के बाद प्रसाद में चूरमा दिया गया। हम प्रसाद लेकर बाहर आए। पता चला कि बाहर एक विशेष कैनटीन है जो मन्दिर की संस्था द्वारा ही चलाई जाती है जिसमें ख़ास जैन पद्धति का भोजन और अल्पाहार मिलता है। भोजन का समय एक बजे से था। हमने सोचा अल्पाहार लेते है पर हमें बताया गया कि यहाँ सिर्फ़ जैनियों को ही दिया जाता है सबको नहीं।

और हम बाहर निकल आए।

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राम की शक्ति पूजा – 8

राम की शक्ति आराधना और मिला शक्ति का वरदान, देखें कवि निराला का शब्द रूपक -

हैं नहीं शरासन आज हस्त तूणीर स्कन्ध
वह नहीं सोहता निविड़-जटा-दृढ़-मुकुट-बन्ध,
सुन पड़ता सिंहनाद,-रण कोलाहल अपार,
उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार,
पूजोपरान्त जपते दुर्गा, दशभुजा नाम,
मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम,
बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण
गहन-से-गहनतर होने लगा समाराधन।

क्रम-क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस,
चक्र से चक्र मन बढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस,
कर-जप पूरा कर एक चढाते इन्दीवर,
निज पुरश्चरण इस भाँति रहे हैं पूरा कर।
चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित-मन,
प्रतिजप से खिंच-खिंच होने लगा महाकर्षण,
संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवी-पद पर,
जप के स्वर लगा काँपने थर-थर-थर अम्बर।
दो दिन निःस्पन्द एक आसन पर रहे राम,
अर्पित करते इन्दीवर जपते हुए नाम।
आठवाँ दिवस मन ध्यान-युक्त चढ़ता ऊपर
कर गया अतिक्रम ब्रह्मा-हरि-शंकर का स्तर,
हो गया विजित ब्रह्माण्ड पूर्ण, देवता स्तब्ध,
हो गये दग्ध जीवन के तप के समारब्ध।
रह गया एक इन्दीवर, मन देखता पार
प्रायः करने हुआ दुर्ग जो सहस्रार,
द्विप्रहर, रात्रि, साकार हुई दुर्गा छिपकर
हँस उठा ले गई पूजा का प्रिय इन्दीवर।

यह अन्तिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल
राम ने बढ़ाया कर लेने को नीलकमल।
कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल,
ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल।
देखा, वह रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय,
आसन छोड़ना असिद्धि, भर गये नयनद्वय,
"धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,
बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन।

"यह है उपाय", कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
"कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।"

कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
"साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!"
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।

"होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।"
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

आप सबको विजयदशमी की शुभकामनाएँ ! दशहरा मुबारक !

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