साहित्य में कविता ही ऐसी विधा है जिसमें क्षणिक अनुभूति भी चित्रित हो जाती है। माना जाता है कि सुई की नोक से लेकर पर्वत तक सभी कविता के विषय है।
अन्य विधाओं में लिखने के लिए विषय को विस्तार देना पड़ता है। कथानक बनाए जाते है। पात्र गढे जाते है। लेकिन कविता छोटी-छोटी सी चार पंक्तियों की भी होती है। कवि को किसी कथानक की भी आवश्यकता नहीं होती। तभी तो कहा जाता है जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि।
अपनी कल्पना की उड़ान भरता कवि किसी भी अनुभव को शब्दों में ढाल लेता है। चार पंक्तियों के मुक्तक से लेकर महाकाव्य तक रचे गए। मिट्टी के कण से लेकर पौराणिक कथाओं तक को काव्य में समेटा गया।
साहित्य से हट कर अगर हम कविता की बात करें तो दो स्थानों पर हमें कविता नज़र आएगी - एक तो फ़िल्मी गीत जिसमें कभी ऊँचे स्तर का काव्य नज़र आता है तो कभी मामूली तुकबन्दी। अब कवि और शायर करें भी क्या जैसी स्थिति हो वैसा काव्य रचे। हिन्दी फ़िल्मों में पारिवारिक रिश्तों पर बहुत कहानियाँ है इसीलिए उन पर काव्य भी बहुत है। यही कारण है कि हमें भाई-बहन के पवित्र बन्धन पर कई गीत मिलते है।
कविता की संभावना जिस दूसरे स्थान पर है वहाँ अपने मन के भावों को तुकबन्दी में ढाल दिया जाता है जिससे अक्सर शायरी बन जाती है - यह है ट्रक पर लिखे शेर जहाँ कभी दो पंक्तियाँ तो कभी एक पंक्ति होती है। कभी-कभार तो कुछ शब्द ही लिखे जाते है जैसे सड़क पर एक वाहन से दूसरे वाहन के बीच दूरी बनाए रखने के लिए लिखा होता है -
मुझे मत छुओ या
दूर से प्यार करो गले मत मिलो
आजकल डीज़ल की लगातार बढती कीमतों को लेकर हमने देखा एक ट्रक की डीज़ल की टंकी पर लिखा था -
कम पी मेरी रानी महंगा है तेरा पानी
मुद्दा ये कि पढे-लिखे हो या अनपढ कविता के माध्यम से अपने मन की बात कह देते है। मुझे लगा कि हर अवसर की बात कविता में मिल जाएगी पर मेरा अनुमान शायद ठीक नहीं निकला। राखी के अवसर पर मैनें कुछ कविताएँ ढूंढने की कोशिश की पर मुझे कुछ नहीं मिला।
ऐतिहासिक घटनाओं पर हिन्दी साहित्य में बहुत लिखा गया पर रानी कर्णावती और हुँमायू के रेशमी धागों के बन्धन पर काव्य में एक पंक्ति भी नहीं मिली। न पौराणिक न ऐतिहासिक न सामाजिक किसी भी संदर्भ में राखी के रेशमी धागे मुझे साहित्य में नज़र ही नहीं आए।
shobha said
मुद्दा ये कि पढे-लिखे हो या अनपढ कविता के माध्यम से अपने मन की बात कह देते है। मुझे लगा कि हर अवसर की बात कविता में मिल जाएगी पर मेरा अनुमान शायद ठीक नहीं निकला। राखी के अवसर पर मैनें कुछ कविताएँ ढूंढने की कोशिश की पर मुझे कुछ नहीं मिला।
एकदम सही लिखा है, मैने भी अनुभव किया है कि जो लोग लिख सकते हैं वो कम लिखते हैं और जो नहीं लिख पाते वो अधिक लिखते हैं,फिर स्तर कैसे मिले।आशा का आँचल मत छोडिए किसी दिन कुछ जरूर मिलेगा। सस्नेह
दिनेशराय द्विवेदी said
इस कमी को अब पूरा किया जा सकता है।
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रक्षा-बंधन का भाव है, “वसुधैव कुटुम्बकम्!”
इस की ओर बढ़ें…
रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकानाएँ!
Annapurna said
धन्यवाद शोभा जी दिनेशराय जी !