Archive for August, 2008

शिरडी के साईंबाबा

पिछले महीने हम शिरडी गए थे।

महाराष्ट्र के इस शिरडी गाँव को साईंबाबा के मन्दिर परिसर की तरह विकसित किया गया है। पूरे परिसर में दुकानें सजी थी फूल और पूजा सामग्री की। फूल दो तरह के थे - एक हार के रूप में साईंबाबा की मूर्ति के लिए और दूसरे गुच्छे के रूप में बाबा की समाधि पर चढाने के लिए।

परिसर में सबसे पहले द्वारकामाई के दर्शन किए जाते है। यह स्थान वास्तव में एक पुरानी मस्जिद थी। बाबा अधिकतर यहीं बैठा करते थे।

मस्जिद में सामने बरामदे जैसा भाग था जिसमें कोने के थोड़े से भाग में रैलिंग होती थी जिसके पीछे बाबा बैठा करते थे और सामने कुछ सीढियाँ नीचे खुले भाग में गाँववासी बैठते थे और चर्चा-परिचर्चा होती थी। इसीलिए यह जगह अधिक महत्वपूर्ण है और सबसे पहले यहीं दर्शन किए जाते है। यहाँ दर्शन के लिए बाबा की आदमकद मूर्ति है।

चित्र में देखिए द्वारकामाई में दर्शन के लिए भक्तों की कतार -

इसके बिल्कुल पास में है चावड़ी। द्वारकामाई में बाबा के दर्शन के तुरन्त बाद चावड़ी में दर्शन के लिए जाया जाता है। माना जाता है कि बाबा रात के समय चावड़ी में सोते थे। इसीलिए चावड़ी में महिलाओं को जाने की मनाही है लेकिन पास में ही बाबा की मूर्ति स्थापित कर दी गई है ताकि महिलाएँ यहाँ दर्शन कर सके।

चित्र में आप देख सकते है महिलाओं और पुरूष के लिए अलग-अलग स्थान बताए गए है -

आगे का विवरण अगले चिट्ठे में…

Comments (11)

लड्डू गोपाल

साहित्य से लेकर सिनेमा तक कृष्ण की गाथाएँ बिखरी पड़ी है।

प्रेम का प्रसंग हो तो राधाकृष्ण, भक्ति की बात चले तो कृष्ण भक्त मीरा, भाग्य से अधिक कर्म में विश्वास की बात हो तो महाभारत के नायक कृष्ण, वीरता की बात चले तो सुदर्शन चक्र धारी कृष्ण, स्नेह की बात चले तो सुभद्रा कृष्ण, परिवार के प्रति प्रीति तो बलराम, भाईचारा हो तो पांडव, मैत्री हो तो सुदामा, संरक्षण की बात हो तो द्रौपदी, कूटनीति हो तो कौरव और शकुनि, दर्प तोड़ना हो तो इन्द्र और गोवर्धन पर्वत, दुष्टों का विनाश हो तो कंस वध, पूतना वध, प्रकृति के बचाव में कालिया नाग को समुद्र से हटाना

इन सभी प्रसंगों पर लेखनी चली लिकिन जब दिन हो जन्माष्टमी का तो छाया रहता है यशोदा का ममत्व और बालक्रीड़ा करते कृष्ण। ऐसी कई छवियाँ है जिनमें से एक छवि बेजोड़ है - कवि रसख़ान ने मात्र चार पंक्तियों में बाललीला से लेकर ईश्वरीय गुण का अनुभव करा दिया है, आप भी आनन्द लीजिए इस छवि का -

धूरि भरे अति शोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी ।
खेलत खात फिरे अँगना पग पैजनिया कटि पीरी कछौटी ॥
वा छवि को रसख़ान विलोकत वारत काम कलानिधि कोटी ।
काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सो ले गयो माखन रोटी ॥

Leave a Comment

कैसे गुम होती है कला

इतिहास के पन्नों में कला के कई नमूने देखने को मिलते है।

आज वास्तविकता में यह कभी-कभार देखने को मिलते है और कुछ तो केवल चर्चा का विषय रह गए है। अब देखें कि कोई कला गुम कैसे होती है।

यह 11 वीं सदी की वास्तुकला का एक नमूना है। मूर्ति की जो छोटी रचनाएं होती है जैसे नाक, आँखें वग़ैरह वह टूटने लगती है जिससे कला का मौलिक रूप बिगड़ने लगता है -

जब यह टूट-फूट अधिक हो जाती है तो समझना मुश्किल हो जाता है कि प्रतिमा का वास्तविक रूप कैसा है। यहाँ अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह गणेश जी की मूर्ति है -

अगर इस टूट-फूट को रोका न गया तो यह कला देखने को ही नहीं मिलेगी और गुम हो जाएगी क्योंकि अब वो कलाकार तो रहे नहीं। जब राजपाट ही समाप्त होने लगता है तब उस दौर की गतिविधियाँ भी तो रूक जाती है।

यह दक्षिण भारत की वास्तुकला है जो काकतीय वंश के शासन में प्रचलित होने से काकतीय कला कहलाई। यह मूर्तियाँ आन्ध्र प्रदेश के वरंगल ज़िले के प्रसिद्ध हज़ार स्तम्भ के मन्दिर में है जिसके बारे में हम पहले ही एक चिट्ठा लिख चुके है।

Comments (2)

Older Posts »