भुवनगिरि क़िले का पहला पहाड़ हमने चढ कर पार किया फिर सीढियाँ चढने लगे।
सीढियाँ चढते हुए दो-तीन बार मोड़ आए जहाँ चढना दुर्गम लगा -
यहाँ कक्ष जैसा है। कुछ देर यहाँ विश्राम किया जा सकता है। इसकी पत्थरों से बनी कमान और क़िले की बनावट देखिए साथ ही नीचे शहर भी देखा जा सकता है -
कुछ देर रूक कर फिर इन पत्थर से बनी सीढियों पर हम चढने लगे। वैसे भी पत्थर की सीढियों पर चढना कठिन होता है फिर यहाँ सफ़ाई भी अधिक नहीं थी जो हमारी दीदी को बहुत ही ख़राब लग रहा था।
यहाँ तक अधिकांश सीढियाँ चढ लेने के बाद जिस जगह हम आए उसे कहते है भूल-भुलैया।
यह जगह ऊबड़-खाबड़ है। यहाँ झाड़-झंखाड़ है, गड्ढे है। सामने नज़र आता है क़िले का ऊपरी छोर और वहाँ तक पहुँचने के लिए तीन अलग-अलग स्थानों पर सीढियाँ दिखाई देती है जिनमें से दो स्थानों की सीढियाँ आगे जा कर समाप्त हो जाएगी और किसी एक स्थान की सीढियाँ ऊपर तक जाएगी पर इन सीढियों तक पहुँचने के लिए रास्ता तलाशना है। इसीलिए इसे कहते है भूल-भुलैया -
आगे का रास्ता हमने पहचान लिया जो चित्र में दिखाई दे रहा है। इस रास्ते को पार करने के बाद आगे अंतिम सीढियाँ है पर इन सीढियों पर चढना बहुत ही कठिन है और कठिन होना भी चाहिए क्योंकि यह अंतिम पड़ाव है।
यहाँ सीढियाँ बहुत ही संकरी है। कुछ सीढियाँ इतनी ऊँची है कि बैठ कर चढना पड़ा। दाहिनी ओर बड़े-बड़े पहाड़ी पत्थर बिखरे पड़े है और झाड़ियाँ भी है। सीढियों के अलावा इसी मैदानी चढाव से भी आगे बढा जा सकता है।
यहाँ है अंतिम पहाड़ जिसे चढ कर ही पार किया जाना है -
सामने पहाड़ के ऊपरी छोर पर नज़र आ रहे थे पाँच कक्ष जो शायद दरबार हाँल और दरबारी कक्ष है क्योंकि हम ऊपर गए नहीं। हमें बताया गया कि इस अंतिम पहाड़ पर चढना कठिन है और उतरना और भी कठिन है।
इस तरह हम चोटी पर पहुँचे बिना ही नीचे उतर आए और एक घण्टे का सफ़र तय कर हैदराबाद लौट आए।




समीर लाल said
बड़ी विकट चढ़ाई दिख रही है.
mehek said
kila ka upari bhag to nahut sundar nazae aa raha hai.
Annapurna said
धन्यवाद समीर जी महक जी !