सुरेन्द्रपुरी मन्दिर में प्रवेश कर हमने सामने देखें नौ ग्रह के नौ मन्दिर जिसके बाद एक कमान लगी है।
इस कमान के बीच में है सात अश्वों (घोड़ों) के रथ पर विराजे सूर्यदेव जिनके पीछे बनी सूर्य की आकृति धूप में सूरज की तरह दमक रही थी -
कमान के भीतर कुछ नहीं है पर कमान के बाएँ भाग पर नीचे तेलुगु में लिखा है - सूर्यचन्द्र मुख द्वारम जिसके हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। शायद यहाँ बाद में मन्दिर बनें। इसके ठीक सामने है मुख्य मन्दिर -
यहाँ तीन गर्भ गृह है। चित्र में जहाँ द्वार पर शिवलिंग दिखाई दे रहा है, पहले हम उसी ओर के गर्भ गृह में गए जहाँ पंचेश्वर रूप में शिवलिंग स्थापित है। पंचेश्वर रूप में शिवलिंग में चारों ओर पार्वती जी की भी आकृति होती है। इसीलिए दर्शन की भी व्यवस्था कुछ अलग है।
आमतौर पर गर्भ गृह में सामने कपाट होते है जहाँ से दर्शन किए जाते है और शेष तीनों ओर दीवारें होती है जिससे परिक्रमा के दौरान मूर्ति के दर्शन नहीं किए जा सकते तथा परिक्रमा पूरी कर सामने से ही फिर दर्शन किए जाते है। यहाँ दीवारों की जगह जाली लगी है।
सामने से शिव-पार्वती के दर्शन किए गए जिसके बाद परिक्रमा करते समय बाएँ, पीछे और दाहिनी ओर से भी जाली में से शिव-पार्वती के दर्शन किए गए।
फिर हम बीच के गर्भ गृह में आए और पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन किए। मूर्ति वैसी ही है जैसी प्रवेश द्वार से भीतर आते ही परिसर में हमने देखी थी।
इसके बाद तीसरा और अंतिम गर्भ गृह बालाजी का है जैसा कि आप ऊपर के चित्र में देख सकते है जहाँ एक ओर शिवलिंग और दूसरी ओर बालाजी की आकृति बनी है। ठीक ऐसी ही मूर्ति गर्भ गृह में स्थापित है।
आन्ध्र प्रदेश में विष्णु जी के बालाजी अवतार को ही अधिक माना जाता है इसीलिए यहाँ के लगभग हर बड़े मन्दिर में बालाजी की मूर्ति होती है।
हम दर्शन कर बाहर आए और सुरेन्द्रपुरी से बाहर निकल आए।


ritu bansal said
बहुत सुन्दर लिखा है। पढ़कर देखने जैसा आनन्द प्राप्त हुआ है। बधाई स्वीकारें।
समीर लाल said
बाहर से ही दर्शन प्राप्त कर धन्य हुए, आपका आभार.
Annapurna said
धन्यवाद ॠतु जी समीर जी !