मल्लिकार्जुन स्वामी मन्दिर के बाहर कुछ देर हमने बाज़ार में चहलक़दमी की। बाज़ार बड़ा था पर वैसा ही था जैसा आमतौर पर मन्दिरों के पास होता है। यहाँ कुछ धर्मशालाएँ भी है।
कुछ दूरी पर आन्ध्रप्रदेश पर्यटन विभाग का रेस्तराँ है जहाँ अच्छा भोजन मिलता है। इसके अलावा खाने की और कोई जगह नहीं है।
यहाँ से हमें लौटना था। साक्षी गणपति का मन्दिर पार करते हुए हम आगे बढते गए और जिस तरह चढाई का आनन्द लिया था अब उतार का आनन्द लेने लगे।
अब हम बाईं ओर जिस स्थान पर रूके उसका नाम है पंचधारा। यहाँ से नीचे देखने पर नीचे सूखी नदी दिखाई दी जिसमें पेड़ों के पत्ते पड़े थे और बाईं ओर पहाड़ों से पानी बह रहा था।
यह देखने के लिए हम सामने से चौड़ी सीढियों से उतरने लगे जो बाद में बाईं ओर मुड़ती है। लगभग साठ-सत्तर सीढियाँ है। हम सीढियाँ उतरे। यहाँ पूर्व और दक्षिण दिशा के आपस में जुड़े पहाड़ों से पानी की पाँच धाराएँ बहती है। ये पाँचों धाराएं पास-पास बहती है।
जैसा कि हम जानते है कि भागीरथ की तपस्या से शिवजी की जटा से गंगा की धारा फूट पड़ी और इस तरह पूर्व दिशा से गंगा धरती पर उतर आई और सभी दिशाओं में फैल गई। इन्हीं में से पाँच दिशाओं से ये पाँच धाराएं आती है ऐसा माना जाता है। इसीलिए यह स्थान पंचधारा कहलाया। यहाँ कुछ वर्ष तक आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी।
जहाँ पाँच धाराएँ बह रही थी वहीं छोटी सी मन्दिरनुमा जगह है जहाँ आदि शंकराचार्या की मूर्ति है। हम सीढियाँ चढकर ऊपर आए और आगे बढे।
आगे कुछ दूरी पर है शिखरम। यहाँ कुछ सीढियाँ चढकर हम ऊपर गए। वैसे गाड़ी से चढाई चढने की भी सुविधा है। यहाँ पूजा की सामग्री के नाम पर एक रूपए में छोटी सी पुड़िया दी जाती है। हमने भी सबके लिए एक-एक पुड़िया ली पर हमें पता नहीं कि इसमें क्या है।
हम भीतर पहुँचे, लगा कैलाश पर्वत पर आ गए। पूरा स्थान ऊँचा वैसे ही बनाया गया है और ऊपर विराजमान है शिवपार्वती। बाईं ओर से सीढियाँ है थोड़ी संकरी और घुमावदार। भीड़ भी बहुत थी। ऊपर चढते गए। पता नहीं ऊपर क्या है। सबसे ऊपर पहुँचे तो लगा वाकई शिखर पर आ गए।
ऊपर खुली छत है जहाँ दूरबीन लगी है। दूरबीन के पास एक व्यक्ति बैठा है जो बारी-बारी से एक-एक को दूरबीन से मन्दिर का शिखर दिखा रहा है। हमनें दूरबीन से देखा मल्लिकार्जुन स्वामी मन्दिर का शिखर चमकता नज़र आया। फिर दूरबीन से हट कर देखा तो शिखर बहुत दूर कहीं धुँधला सा नज़र आ रहा था। तब हमें लगा वाकई यह श्रीशैलम की सबसे ऊँची जगह है।
फिर पलटे तो नन्दी विराजमान थे। अब यहाँ के पुजारी के कहने पर हमने पुड़िया खोली उसमें से काली तिल के दाने निकले जिसे नन्दी पर चढाया फिर नन्दी के दोनों सिंगों पर ऊँगलियाँ रखकर बीच से मन्दिर का शिखर देखा। नन्दी की स्थापना ऐसी की शिखर नज़र आने लगा। इसीलिए श्रीशैलम को दक्षिण का कैलाश कहा जाता है।
हम नीचे उतर आए। आगे बढे। लगभग पूरा रास्ता पार कर गए। यहाँ हमने देखी पाताल गंगा। कृष्णा नदी का पानी तेज़ी से बह रहा था। यह स्थान सबसे नीचा है इसीलिए यह है पाताल गंगा -
यहाँ आस्था के नारियल चढाए जाते है पूर्वजों को पानी दिया जाता है।
यहाँ एक और स्थान है ईष्ट कामेश्वरी का मन्दिर जहाँ हम जा नहीं पाए। यह वास्तव में मन्दिर नहीं है। दाहिनी ओर जंगल में एक पगडंडी है जहाँ से दस किलोमीटर की दूरी पर ईष्ट कामेश्वरी की मूर्ति है। बकायदा मन्दिर जैसा नहीं है।
यहाँ विशेष गाड़ी में जाते है जो छोटी टैम्पो जैसी होती है। कोई और गाड़ी इस पगडंडी से गुज़र ही नहीं सकती क्योंकि दोनों ओर इतना घना जंगल है। गाड़ियों को पहले से बुक कराया जाता है। हम जिस दिन गए उस दिन एकाध गाड़ी कम थी इसीलिए हमें मिल नहीं पाई। वैसे ज्यादा नहीं कुल दो-तीन गाड़ियाँ ही चलती है। अक्सर लोग यह जगह देखने के लिए भीतर दस किलोमीटर तक जाने में संकोच ही करते है।
इस स्थान की विशेषता यह है कि यहाँ सिर्फ़ माता की मूर्ति रखी है। आमतौर पर मन्दिरों में कुछ दूरी से ही चढावा चढाया जाता है पर यहाँ केवल महिलाएँ मूर्ति के माथे पर कुमकुम का टीका लगाती है और टीका लगाते समय ऐसा लगता है जैसे साक्षात किसी महिला को टीका लगाया जा रहा है।
लगता है जिस तरह से अमरनाथ में प्राकृतिक रूप से जिस तरह निश्चित समय पर गुफ़ा में निश्चित रूप में बर्फ़ गिरने से शिवलिंग बनता है उसी तरह घने जंगल में स्थित मूर्ति पर जब सामने से टीका लगाया जाता है तब टीका लगाने वाले की छाया और घने जंगल से जीवित स्त्री का आभास होने लगता है बाकी सब तो श्रृद्धा और विश्वास की बातें है।
इस तरह यह स्थान न देख पाने का मलाल लिए हम यात्रा समाप्त कर हैदराबाद लौट आए।





