Archive for July, 2008

श्रीशैलम – दक्षिण का कैलाश

मल्लिकार्जुन स्वामी मन्दिर के बाहर कुछ देर हमने बाज़ार में चहलक़दमी की। बाज़ार बड़ा था पर वैसा ही था जैसा आमतौर पर मन्दिरों के पास होता है। यहाँ कुछ धर्मशालाएँ भी है।

कुछ दूरी पर आन्ध्रप्रदेश पर्यटन विभाग का रेस्तराँ है जहाँ अच्छा भोजन मिलता है। इसके अलावा खाने की और कोई जगह नहीं है।

यहाँ से हमें लौटना था। साक्षी गणपति का मन्दिर पार करते हुए हम आगे बढते गए और जिस तरह चढाई का आनन्द लिया था अब उतार का आनन्द लेने लगे।

अब हम बाईं ओर जिस स्थान पर रूके उसका नाम है पंचधारा। यहाँ से नीचे देखने पर नीचे सूखी नदी दिखाई दी जिसमें पेड़ों के पत्ते पड़े थे और बाईं ओर पहाड़ों से पानी बह रहा था।

यह देखने के लिए हम सामने से चौड़ी सीढियों से उतरने लगे जो बाद में बाईं ओर मुड़ती है। लगभग साठ-सत्तर सीढियाँ है। हम सीढियाँ उतरे। यहाँ पूर्व और दक्षिण दिशा के आपस में जुड़े पहाड़ों से पानी की पाँच धाराएँ बहती है। ये पाँचों धाराएं पास-पास बहती है।

जैसा कि हम जानते है कि भागीरथ की तपस्या से शिवजी की जटा से गंगा की धारा फूट पड़ी और इस तरह पूर्व दिशा से गंगा धरती पर उतर आई और सभी दिशाओं में फैल गई। इन्हीं में से पाँच दिशाओं से ये पाँच धाराएं आती है ऐसा माना जाता है। इसीलिए यह स्थान पंचधारा कहलाया। यहाँ कुछ वर्ष तक आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी।

जहाँ पाँच धाराएँ बह रही थी वहीं छोटी सी मन्दिरनुमा जगह है जहाँ आदि शंकराचार्या की मूर्ति है। हम सीढियाँ चढकर ऊपर आए और आगे बढे।

आगे कुछ दूरी पर है शिखरम। यहाँ कुछ सीढियाँ चढकर हम ऊपर गए। वैसे गाड़ी से चढाई चढने की भी सुविधा है। यहाँ पूजा की सामग्री के नाम पर एक रूपए में छोटी सी पुड़िया दी जाती है। हमने भी सबके लिए एक-एक पुड़िया ली पर हमें पता नहीं कि इसमें क्या है।

हम भीतर पहुँचे, लगा कैलाश पर्वत पर आ गए। पूरा स्थान ऊँचा वैसे ही बनाया गया है और ऊपर विराजमान है शिवपार्वती। बाईं ओर से सीढियाँ है थोड़ी संकरी और घुमावदार। भीड़ भी बहुत थी। ऊपर चढते गए। पता नहीं ऊपर क्या है। सबसे ऊपर पहुँचे तो लगा वाकई शिखर पर आ गए।

ऊपर खुली छत है जहाँ दूरबीन लगी है। दूरबीन के पास एक व्यक्ति बैठा है जो बारी-बारी से एक-एक को दूरबीन से मन्दिर का शिखर दिखा रहा है। हमनें दूरबीन से देखा मल्लिकार्जुन स्वामी मन्दिर का शिखर चमकता नज़र आया। फिर दूरबीन से हट कर देखा तो शिखर बहुत दूर कहीं धुँधला सा नज़र आ रहा था। तब हमें लगा वाकई यह श्रीशैलम की सबसे ऊँची जगह है।

फिर पलटे तो नन्दी विराजमान थे। अब यहाँ के पुजारी के कहने पर हमने पुड़िया खोली उसमें से काली तिल के दाने निकले जिसे नन्दी पर चढाया फिर नन्दी के दोनों सिंगों पर ऊँगलियाँ रखकर बीच से मन्दिर का शिखर देखा। नन्दी की स्थापना ऐसी की शिखर नज़र आने लगा। इसीलिए श्रीशैलम को दक्षिण का कैलाश कहा जाता है।

हम नीचे उतर आए। आगे बढे। लगभग पूरा रास्ता पार कर गए। यहाँ हमने देखी पाताल गंगा। कृष्णा नदी का पानी तेज़ी से बह रहा था। यह स्थान सबसे नीचा है इसीलिए यह है पाताल गंगा -

यहाँ आस्था के नारियल चढाए जाते है पूर्वजों को पानी दिया जाता है।

यहाँ एक और स्थान है ईष्ट कामेश्वरी का मन्दिर जहाँ हम जा नहीं पाए। यह वास्तव में मन्दिर नहीं है। दाहिनी ओर जंगल में एक पगडंडी है जहाँ से दस किलोमीटर की दूरी पर ईष्ट कामेश्वरी की मूर्ति है। बकायदा मन्दिर जैसा नहीं है।

यहाँ विशेष गाड़ी में जाते है जो छोटी टैम्पो जैसी होती है। कोई और गाड़ी इस पगडंडी से गुज़र ही नहीं सकती क्योंकि दोनों ओर इतना घना जंगल है। गाड़ियों को पहले से बुक कराया जाता है। हम जिस दिन गए उस दिन एकाध गाड़ी कम थी इसीलिए हमें मिल नहीं पाई। वैसे ज्यादा नहीं कुल दो-तीन गाड़ियाँ ही चलती है। अक्सर लोग यह जगह देखने के लिए भीतर दस किलोमीटर तक जाने में संकोच ही करते है।

इस स्थान की विशेषता यह है कि यहाँ सिर्फ़ माता की मूर्ति रखी है। आमतौर पर मन्दिरों में कुछ दूरी से ही चढावा चढाया जाता है पर यहाँ केवल महिलाएँ मूर्ति के माथे पर कुमकुम का टीका लगाती है और टीका लगाते समय ऐसा लगता है जैसे साक्षात किसी महिला को टीका लगाया जा रहा है।

लगता है जिस तरह से अमरनाथ में प्राकृतिक रूप से जिस तरह निश्चित समय पर गुफ़ा में निश्चित रूप में बर्फ़ गिरने से शिवलिंग बनता है उसी तरह घने जंगल में स्थित मूर्ति पर जब सामने से टीका लगाया जाता है तब टीका लगाने वाले की छाया और घने जंगल से जीवित स्त्री का आभास होने लगता है बाकी सब तो श्रृद्धा और विश्वास की बातें है।

इस तरह यह स्थान न देख पाने का मलाल लिए हम यात्रा समाप्त कर हैदराबाद लौट आए।

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श्रीशैलम – मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर

कृष्णा बाँध के नरीमन प्वाइंट्स पर रूक-रूक आनन्द लेते हुए हम पूरी चढाई चढकर मुख्य मंदिर के मुख्य रास्ते पर पहुँचे।

यहाँ बाईं ओर गणपति का छोटा सा मन्दिर है जिसे साक्षी गणपति कहते है। जैसा कि हम सब जानते है कि गणपति प्रथम देवता है और सबसे पहले गणेश पूजन ही किया जाता है। हमने भी यहाँ पूजा की।

सड़क पर ही छोटा सा जाली का कक्ष जैसा है जिसमें गणेश की प्रतिमा है। दर्शन के लिए लाइन सड़क पर ही लगानी है और यहीं पर पूजा की सामग्री बिकती है। लाइन ज्यादा लम्बी नहीं थी और दर्शन जल्दी हो गए।

इस तरह श्रीशैलम में प्रथम पूजा प्रथम देवता की सम्पन्न कर मुख्य मन्दिर के लिए आगे बढा जाता है शायद इसीलिए इसे साक्षी गणपति कहते है कि गणपति साक्षी है कि किन भक्तों ने मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए चढाई पूरी की।

इसके थोड़ी ही दूरी पर है मुख्य मन्दिर। श्रीशैलम पर्वत पर बने इस मन्दिर में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थापित है जिसका बारह ज्योतिर्लिंगों में चौथा स्थान है। इसे मल्लिकार्जुन स्वामी कहते है और इस मन्दिर को मल्लिकार्जुन स्वामी का मन्दिर कहते है।

श्रावण मास में इस मन्दिर में शिवजी की पूजा का बहुत महत्व है। यह है मन्दिर का मुख्य द्वार -

यह बड़ा द्वार तो बन्द रहता है, किनारे के छोटे द्वार से भीतर प्रवेश किया जाता है। भीतर एक लम्बा गलियारा पार करने के बाद दाहिनी ओर क्लाँक रूम में हमने अपना कैमरा, सेलफोन वग़ैरह रखवाया और बाईं ओर लगी टिकट खिड़कियों पर आ गए।

सौ रूपए प्रति व्यक्ति से टिकट ख़रीदा और विशेष दर्शन की कतार में खड़े हो गए क्योंकि भीड़ इतनी थी कि हम भक्तों की सीधी कतार में निःशुल्क दर्शन की सोच भी न पाए।

वैसे इस तरह के दर्शन हमें अच्छे नहीं लगते है, लगता है जैसे भगवान से मिलने के लिए हमारे पास समय नहीं है और हम किसी तरह जल्दी से दर्शन कर औपचारिकता पूरी करना चाहते है। लेकिन भीड़ बहुत थी इसीलिए हमने सोचा अगले दिन सुबह पाँच बजे मन्दिर खुलता है, हम साढे चार बजे ही आ जाएगें पर अफ़सोस सुबह साढे चार बजे भी बहुत भीड़ थी और हमें दुबारा विशेष दर्शन का टिकट लेना पड़ा।

भीतर गर्भगृह में नीम अँधेरा था। हमनें ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए। तीरथ लिया। इसके ठीक सामने एक और शिवलिंग स्थापित था जहाँ लोग बैठे शिवलिंग का अभिषेक कर रहे थे। पंडितजी अभिषेक करवा रहे थे। अधिकतर लोग जोड़े से बैठे थे यानि पति-पत्नी साथ-साथ। इस अभिषेक के लिए विशेष शुल्क देकर टिकट लेना पड़ता है।

हम गर्भगृह से बाहर निकल आए। दूसरी ओर स्थित माता के मन्दिर में हमने पूजा-अर्चना की। कुछ देर मन्दिर के विशाल प्रांगण में बैठे रहे। फिर पीछे की ओर लगे काउंटर से हमने प्रसाद लिया और मन्दिर से बाहर निकल आए।

आगे का विवरण अगले चिट्ठे में।

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श्रीशैलम में सावन और श्रावण

सावन में नदी, पर्वत, घाटियाँ, हरियाली बहुत लुभाते है। सावन के महीने में ऐसे स्थानों पर जाना और नंगे पैर हरियाली पर चलना अच्छा माना जाता है।

तीज मनाना, झूला झूलना इन्हीं दिनों में होता है। सावन शब्द वास्तव में श्रावण है। श्रीशैलम में सावन और श्रावण दोनों है।

कृष्णा नदी की पहली झलक देखते हुए हम आगे बढे और देखा कृष्णा बाँध जो कृष्णा डैम या कृष्णा रीवर डैम के नाम से मशहूर है -

रूई के गोलों की तरह पानी जो आगे बढ कर सफ़ेद धुँआ हो जाता है -

नदी में गिरते पानी का शोर अच्छा लगता है। सफ़ेद झक लगता है गिरता पानी और यहाँ नदी भी दुधिया लगती है जिस पर हल्की धूप पड़ने से नदी में इन्द्रधनुष दिखने लगता है -

यही है पहला नरीमन प्वाइंट। यहाँ आइसक्रीम, कूल ड्रिंक जैसी सभी चीज़े मिलती है। पूरी चढाई में ऐसे चार नरीमन प्वाइंट्स है।

यह देखिए पूरी रवानगी से बहती कृष्णा नदी जो यहाँ मटमैली लग रही है -

मटमैलेपन का कारण है इसमें जाल डालकर मछलियाँ पकड़ना, बोटिंग करना।

इसी सारे रास्ते में मन्दिर और पवित्र स्थल भी है पर पहले चोटी पर स्थित मुख्य मन्दिर में पूजा-अर्चना की जाती है फिर लौटते समय उन पुण्य स्थलों को देखा जाता है। इस तरह जाते समय सावन का आनन्द और लौटते समय श्रावण का आनन्द लिया जाता है।

जो सिर्फ़ पिकनिक के लिए श्रीशैलम आते है वे पहले या दूसरे नरीमन प्वाइंट्स तक ही आते है। इसीलिए यहीं पर ठहरने के लिए लाँज और एकाध होटल भी है और इसके बाद ऊपर प्रमुख मंदिर तक कुछ भी नहीं है।

यहाँ मैं आपको एक बात बता दूँ कि आन्ध्रप्रदेश में विशेषकर हैदराबाद में स्कूल, काँलेज और घर-परिवार से भी सिर्फ़ पिकनिक के लिए भी श्रीशैलम जाते है।

अगले चिट्ठे में श्रावण का आनन्द।

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