यादगिरी गुट्टा में नरसिंह भगवान के दर्शन कर हम हैदराबाद लौटने लगे।
कुछ ही दूरी पर बाईं ओर दूर से नज़र आई देवताओं की विशाल मूर्तियाँ और बड़ा परिसर जहाँ अभी कुछ निर्माण कार्य चल रहा था। हमने सोचा यहाँ देखे क्या है और गाड़ी रोक दी।
यह है परिसर का प्रवेश द्वार जिसके दाहिने बाँए है रक्षक के रूप में मूर्तियाँ। यह है दाहिने रक्षक -
इस बोर्ड पर तेलुगु में लिखा है - श्री कन्ची कामामोटी, जगदगुरू श्री शंकराचार्य संस्थानम फिर बड़े अक्षरों में है मन्दिर का नाम सुरेन्द्रपुरी पंचमुखी फिर नीचे लिखा है हनुमन्दिश्वर देवस्थानम। इसके हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है।
रक्षक के रूप में दो मूर्तियाँ है - काल देवता और नाग देवता की।
और यह है बाएँ रक्षक -
वज्रमुश्ती और गरूण जिनके हाथ मे है बोर्ड जिस पर तेलुगु में लिखा है - सुरेन्द्रपुरी
दाएँ और बाएँ दोनों ओर के रक्षकों के पीछे जाली के दो प्रवेश द्वार लगे है जिसके बीच में गोलाकार हरे-भरे चबूतरे पर है यह विशाल मूर्ति -
मूर्ति के पीछे निर्माण कार्य चल रहा है और मूर्ति के नीचे धुँधले दिखाई दे रहे काले बोर्ड पर तेलुगु में लिखा है कि वज्र विजय के बाद ऐरावत पर विराजमान है सुरेन्द्र और आस-पास नृत्य कर रहे है उर्वशी, मेनका, रंभा…
ऊपर चित्र में आप देख सकते है ऐरावत पर सिंहासन पर विराजे इन्द्र और नीचे दाएँ-बाएँ उनका स्वागत करती मूर्तियाँ है और पीछे इन्द्र के सिंहासन पर नृत्य करती आकृतियाँ है जिसमें नर्तकियाँ नृत्य कर रही है और नर्तक गले में लटके डमरू बजा रहे है। पूरा उल्लास का वातावरण नज़र आता है इस भव्य और कलात्मक मूर्ति में।
ऐसा है शानदार सुरेन्द्रपुरी का प्रवेश द्वार। इस इन्द्रलोक में विराजमान देवी-देवताओं को देखें अगले चिट्ठे में…



sameerlal said
शानदार…अगली पोस्ट का इन्तजार है.
mehek said
wow this is simply beautiful,praveshdwar par pehera deti kal dev naag dev ki murti bahut pasand aayi,surendre puri ka kya ye to swarg ka praweshdwar lagta hai bahut sundar,aapke pravas mein sabse sabse khubsurat jagah.
Annapurna said
धन्यवाद समीर जी महक जी !