वास्तव में लक्ष्मीनारायणा स्वामी मन्दिर के गर्भ गृह में जाते ही हम आश्चर्य चकित रह गए।
बहुत पहले जब हम यहाँ आए थे तब एक ही मूर्ति थी जो नरसिंह अवतार का वास्तविक स्वरूप था।
विष्णु जी के नरसिंह अवतार के वास्तविक रूप में मुखमण्डल गुस्से में तमतमाता है, जीभ बाहर निकली होती है जिसके दोनों किनारों से नुकीले दाँत निकले होते है। दोनों हाथों के नख (नाखून) लम्बे होते है और लगता है अपने इन हाथों को आगे बढाते हुए रोष में आगे बढ रहे है और मुख से लगता है जैसे सिंह की गर्जना निकल रही हो।
बिल्कुल ऐसी ही मूर्ति थी पहले जिसे देख कर लगता था जैसे अभी-अभी हिरण्य कश्यप के दरबार के स्तम्भ से निकले हो और हिरण्य कश्यप का वध करने आगे बढ रहे हो। पर अब जो मूर्ति रखी है उसमें नरसिंह भगवान प्रसन्नचित्त है और लग रहा है जैसे आशीर्वाद दे रहे है।
मन्दिर की सीढियाँ उतरते हुए हम यही चर्चा कर रहे थे कि हमने देखा कुछ लोग एक पुरोहित जी को घेरे खड़े है और पुरोहित जी माइक पर बोली लगा रहे है और आस-पास साड़ियाँ और दुशाले रखे है। लोग बोली लगा कर इन साड़ियों और दुशालों को प्रसाद के रूप में खरीद रहे है।
हमें बताया गया कि जो चढावे में वस्त्र चढाते है उनके नाम और गोत्र लिख लिए जाते है जैसा कि हमने पिछले चिट्ठे में बताया था कि हमारा नाम और गोत्र भी लिखा गया।
इन सभी वस्त्रों को सवेरे अभिषेक के समय भगवान के सामने रखा जाता है और अभिषेक करते समय मंत्रोच्चार के साथ सभी के नाम-गोत्र भी बोले जाते है। फिर सभी वस्त्रों को एक-एक दिन बारी से भगवान पर चढाया जाता है फिर नीलाम किया जाता है जिसे श्रृद्धालु प्रसाद की तरह खरीदते है और इन पैसों को मन्दिर के कोष में जमा किया जाता है।
जब हमने पुरानी मूर्ति के बारे में पूछा तो बताया गया कि पुरानी मूर्ति पुराने मन्दिर में है। फिर हम नीचे उतर आए। इस बार भी चार सौ सीढियाँ नहीं उतरी और गाड़ी से ही नीचे आए।
पुराना मन्दिर एक से दो बजे तक बन्द रहता है। एक बज रहा था तो हमने सोचा कि भोजन करने के बाद ही मन्दिर जाएगें।
मन्दिर के जिस परिसर में हमने सुबह सबसे पहले प्रवेश किया था वहीं बाईं ओर का रास्ता पुराने मन्दिर का है। जैसे ही इस रास्ते पर आए हमने ताँगें देखे। पुराने मन्दिर की ओर या तो निजि गाड़ियाँ जा रही थी या ताँगे। वैसे कुछ लोग पैदल भी जा रहे थे। रास्ता लगभग दो किलोमीटर का था।
हम भी ताँगे से गए -
मन्दिर के पास पहुँचे तो वहाँ तांगा स्टैंड भी था। किराया तय था - प्रति व्यक्ति दस रूपए।
मन्दिर परिसर में दाईं ओर पहाड़ पर जाती लगभग बीस-पच्चीस सीढियाँ चढ कर हम ऊपर पहुँचे। वैसे सीढियाँ न चढ पहाड़ पर चढ कर भी ऊपर पहुँचा जा सकता है।
बाईं ओर कुंड है। यह कुंड और भी गन्दा है, पर एक बात है यहाँ एक मोटे लोहे के पाइप से पानी कुंड में गिर रहा था और यह गिरता पानी बहुत साफ़ था। इसका मतलब किसी साफ़ जगह से नियमित पानी सप्लाई होता है।
कुंड के पास ही है हनुमान जी का मन्दिर। दर्शन कर हम नीचे उतर आए। फिर आगे मुख्य मन्दिर है। यहाँ भी नरसिंह भगवान की प्रसन्नचित्त मूर्ति है जो पहाड़ी से लगी सामने है यानि गुहा के भीतर नहीं है। हमने जब पुरानी मूर्ति के बारे में पूछा तो बताया गया कि पुरानी मूर्ति इस मूर्ति के ठीक पीछे पहाड़ी से लगी है।
इस तरह पुरानी मूर्ति या कहे नरसिंह अवतार के वास्तविक रूप की मूर्ति हमें वहाँ देखने को नहीं मिली। हो सकता है कि यह पुरानी मूर्ति खंडित हो गई हो और दर्शन के लिए नहीं रखी गई हो शायद…

Ajit Kumar Mishra said
आपने यात्रा वृतांत अच्छा लिखा है लेख से लगता है कि जाने के उद्येश्य धार्मिक न होकर यात्रिक था तथा पुरानी मूर्ति को देखने का कौतुहूल था। कृपया इस मंदिर के स्थान तथा कैसे पहुँचा जाये यह भी बताऐं।
mehek said
murti aur mandir ka varana achha laga.
Annapurna said
अजीत जी, हैदराबाद से उप्पल रोड के बाद भोंगिर (वास्तविक नाम भुवन्गिर) सड़क पर सीधे चले जाइए। दो घण्टे का रास्ता है। एक घण्टे का रास्ता तय करने के बाद बाईं ओर एक कमान दिखेगी जिस पर नरसिंह भगवान की मूर्ति है यहीं से बाईं सड़क पर सीधे चले जाइए।
हैदराबाद से यादगिरी गुट्टा के लिए बहुत सी बसें जाती है। सड़क अच्छी है निजि वाहन से भी जा सकते है। अधिक जानकारी के लिए पिछले दो चिट्ठे पढ लीजिए।
धन्यवाद महक जी !
समीर लाल said
बहुत बढ़िया वृतांत..लिखते रहें.
Annapurna said
धन्यवाद समीर जी !