मैसूर में जिस अन्तिम स्थल की हमने सैर की वो है वृन्दावन गार्डन
यहाँ पहुँचते ही गाड़ियों का काफ़िला देख कर हम हैरान हो गए - अररे ! इतने लोग आए है सैर के लिए !
हमने टिकट लिया साथ में कैमरे के लिए भी पचास रूपए का टिकट लिया और भीतर जाने के लिए लाइन में खड़े हो गए। कुछ देर बाद भीतर पहुँचे।
बाईं ओर से आगे बढते गए। बहुत सुन्दर संवारा गया बगीचा और फव्वारे। कुछ देर रूक कर फिर आगे कुछ सीढियाँ चढते गए और देखते गए कुछ और सुन्दर बगीचे और फव्वारे।
फिर हमने देखा बीचों-बीच छोटी-छोटी सी सीढियाँ और उस पर पानी का रेला। देखते ही हमें याद आ गए महमूद और उनकी फ़िल्म पड़ोसन -
सबसे ज्यादा याद आ गया वह सीन जहाँ सायरा बानो ज़ोर से पुकारती है - मास्टरजी ! और महमूद इंगेमा कहते हुए एक हाथ से लुंगी पकड़ कर तेज़ चलते हुए पूरे बगीचे का चक्कर लगाते हुए सायरा बानो के पास पहुँचते है।
हमें लगता है इस फ़िल्म के बाद से ही शायद यह गार्डन अधिक लोकप्रिय हुआ। ख़ैर…
अँधेरा होते ही पूरा गार्डन रंग-बिरंगी रोशनी में नहा गया -
फव्वारों को देखकर लग रहा था जैसे लाल पीला हरा नीला पानी झिलमिला रहा हो -
ऊपर कुछ फव्वारों में सुन्दर मूर्तियाँ भी लगी थी। इसके बाद हम नीचे लौट कर आने लगे और प्रवेश द्वार के पहले दूसरी ओर सैर के लिए पुल की ओर बढ गए। बीच में छोटा सा पुल दाहिनी ओर पानी जिसमें लोग बोटिंग का आनन्द ले रहे थे पर बाईं ओर पानी भी नहीं था और इस जगह को संवारा भी नहीं गया था।
पुल पर सैर कर ठंडी हवा का आनन्द लेकर हम लौट आए। यहाँ चाय, काँफ़ी, फलों के रस, कूल ड्रिंक, कटे फल, आइसक्रीम जैसा सभी बिक रहा था।
वाकई यह अंतिम सैर बहुत ही अच्छी रही। लेकिन कोई भी यात्रा का विवरण तब तक अधूरा रहता है जब तक हम वहाँ के खान-पान की बात न करें। तो अगले चिट्ठे में हम करेगें इसकी चर्चा।



mehhekk said
hey this is so cool place,its marvolous,those lightings in garden fabolous
समीर लाल said
बढ़िया तस्वीरें एवं रोचक वृतांत. आभार. खान पान का इन्तजार है चर्चा में ही सही.
Annapurna said
धन्यवाद महक जी समीर जी !