मैसूर के महाराजा का महल देखने के बाद हम चल पड़े चामुंडेश्वरी मन्दिर की ओर।
जहाँ से चामुंडेश्वरी मन्दिर के लिए चढाई शुरू होती है वहीं से बाईं ओर निचला रास्ता ललिता महल की ओर जाता है। यह महल मैसूर की महारानी का है। अब यहाँ संग्रहालय है।
इसी निचले रास्ते के बाईं ओर है चन्दन के पेड़। जैसे-जैसे हम चढाई चढते गए हमें चन्दन के पेड़ों का जंगल सा नज़र आया पर बताया गया कि वास्तव में पेड़ बहुत कम हो गए है शायद इसका एक कारण तस्करी है। ख़ैर…
इस दाहिने रास्ते पर हमारी गाड़ी चढाव चढती जा रही थी कि हमें एक बोर्ड दिखाई दिया जिस पर लिखा था यह दक्षिण की सबसे दुर्गम पहाड़ी है।
आगे जाने के बाद हमने देखी दाहिनी ओर स्थापित नन्दी की विशाल प्रतिमा। बहुत सुन्दर गढी गई है यह प्रतिमा। गले पर शिव, पार्वती, गणपति, कार्तिकेय की छोटी-छोटी आकृतियाँ है -
हमने नन्दी की पूजा की परिक्रमा की। नन्दी के पिछली ओर छोटी सी गुफ़ा है जो चित्र में भी आपको नज़र आ रही है जिसमें बैठे-बैठे भीतर जाना पड़ता है। भीतर शिवलिंग है। भीतर जगह बड़ी है। पंडितजी भी विराजते है। पूजा हुई और प्रसाद बँटा। प्रसाद लेकर हम बैठे-बैठे गुफ़ा से बाहर आए।
नन्दी के मुख की ओर से ऊपर जाने के लिए सीढियाँ शुरू होती है। लगभग एक हज़ार सीढियाँ चढकर चामुंडेश्वरी मन्दिर जाया जाता है पर हमने बाईं ओर का सड़क का रास्ता लिया और गाड़ी से ऊपर गए।
ऊपर जहाँ गाड़ी पार्क की वहाँ बाज़ार लगा था जैसा कि आमतौर पर मन्दिरों के पास होता है। यहाँ एक चीज़ हमें नई और अच्छी लगी - लकड़ी की छोटी कलात्मक कलशनुमा डिबिया जो दस रूपए में एक बेची जा रही थी।
बताया गया कि इस डिबिया को मन्दिर में पुजारी को देने पर पुजारी चामुंडेश्वरी देवी पर चढाया गया कुमकुम इसमें भर कर प्रसाद के रूप में देंगें। चाहे तो एक से अधिक डिबिया भी ले सकते है जिससे दूसरों को भी देवी माँ का यह प्रसाद दे सकें।
पूजा की सामग्री हमनें खरीदी जिसमें सफ़ेद, हल्के और गहरे गुलाबी रंग के बहुत सुन्दर और ताज़े कमल के फूल अधिक थे जिसके साथ हमनें डिबिया भी खरीदी और बढ गए मन्दिर की ओर। इक्का-दुक्का बन्दर नज़र आने लगे। जैसे-जैसे हम मन्दिर के समीप बढते गए बन्दरों की संख्या भी बढती गई।
बाहर से मन्दिर -
गुम्बद पर देवी के सभी रूपों की कलाकृतियाँ उकेरी गई है -
भीतर पत्थर से बने इस मन्दिर में नीम अँधेरे में माँ चामुंडेश्वरी की विशाल प्रतिमा दमक रही थी। भीड़ अधिक नहीं थी। हमने पंडितजी को डिबिया के साथ पूजा की सामग्री दी और पंडितजी ने प्रसाद के साथ डिबिया में प्रसाद रूपी कुमकुम भी भर कर दिया। हम पूजा और परिक्रमा कर बाहर आए। पिछवाड़े छोटे से मन्दिर में गणपति और शिवलिंग भी है। यहाँ भी पूजा कर हम लौट आए।
यहाँ से हम बाहर निकले और हमारा अगला कार्यक्रम था वृन्दावन गार्डन की सैर पर रास्ते में हमने देखी पश्चिमी वाहिनी नदी। जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि यह नदी पश्चिम दिशा से निकलती है जबकि सभी नदियाँ पूर्व दिशा से निकलती है। इसीलिए यहाँ तर्पण आदि कार्य सम्पन्न होते है। यहाँ शिवजी का छोटा सा मन्दिर भी है।



mamta said
१९८० मे हम गए थे। आज आपने पुरानी यादें ताजा कर दी।
समीर लाल said
बहुत आभार इन सारी जानकारियों के लिए. जारी रहिये. इन जगहों पर बहुत पहले की गई अप्नी यात्रा की यादें जाग रही हैं.
mehhekk said
jitni khubsurat jankari,utani hi khubsurat tasveerein,khas kar nandi ki photo awesome
amitsri108 said
OM DANSTRA KARAL VADNE SHIROMALA VIBHUSNE,CHAMUNDE MUND MATHNE NARAYANI NAMOSTUTE.
Annapurna said
धन्यवाद ममता जी समीर जी महक जी !
अमित जी श्लोक के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद !