Archive for June, 2008

नौ मन्दिर में नौ ग्रह

सुरेन्द्रपुरी मन्दिर परिसर में बाएँ कोने में मन्दिर का प्रवेश द्वार है - शेषनाग पर ब्रह्मा विष्णु महेश की मूर्तियाँ

प्रवेश द्वार से भीतर रंग-बिरंगे कलश नज़र आ रहे है, ये है नौ ग्रह के नौ मन्दिर -

एक बड़े चबूतरे पर नौ छोटे मन्दिर है। हर ग्रह का एक मन्दिर यानि नौ ग्रह के नौ मन्दिर। हर मन्दिर में एक ग्रह की मूर्ति है। मूर्तियों की स्थापना अलग-अलग दिशाओं में ठीक वैसे ही है जैसे आमतौर पर मन्दिरों में होती है। यहाँ हर ग्रह की अलग-अलग परिक्रमा भी की जा सकती है और नौ ग्रह की एक साथ भी परिक्रमा की जा सकती है जैसा कि आमतौर पर करते है।

जिस दिशा में मूर्ति स्थापित है उसी ओर किवाड़ है। इस तरह इस बड़े चबूतरे पर इन मन्दिरों के बीच से घूमते हुए एक-एक मन्दिर में एक-एक ग्रह के दर्शन करने पड़ते है। वैसे सभी किवाड़ बन्द थे पर किवाड़ का ऊपरी आधा भाग जाली से बना होने से मूर्तियाँ हम देख पाए। लगता है दर्शनों के लिए अभी इसे अधिकृत तौर पर खोला नहीं गया है क्योंकि मन्दिर इस समय खुला था।

ग्रहों के अनुसार मन्दिरों के रंग है जैसे शनि महाराज की मूर्ति जिस मन्दिर में है उस मन्दिर का रंग गहरा गुलाबी है। राहु ग्रह का मन्दिर स्लेटी रंग का है। चन्द्र ग्रह के मन्दिर सफ़ेद है।

मैनें ऐसी व्यवस्था पहली बार देखी। आमतौर पर मन्दिर में सभी देवी-देवताओं के दर्शन करने के बाद नौ ग्रह के दर्शन किए जाते है और यह माना जाता है कि नौ ग्रह के दर्शन के बाद फिर मन्दिर में देवी-देवता के दर्शन नहीं किए जाने चाहिए। इसीलिए मन्दिरों में अक्सर बाहरी ओर एक चबूतरे पर ही नौ ग्रह की मूर्तियाँ स्थापित की जाती है जिनके दर्शन कर परिक्रमा करने के बाद सीधे बाहर जा सकें।

यहाँ प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही नौ ग्रह है, लगता है यह प्रवेश द्वार अस्थायी है और बाद में इसे बाहर निकलने का द्वार रख कर मन्दिर का प्रवेश द्वार बीच में रखेगें जैसा कि मैनें पिछले चिट्ठे में बताया।

प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही दाहिनी ओर यानि नौ ग्रह मन्दिर के ठीक सामने दो ही दुकानें थी जहाँ पूजापा (पूजा की सामग्री) बिक रही थी। कोई बाज़ार यहाँ नज़र नहीं आया।

नौ ग्रह मन्दिर के बाद जैसा कि चित्र में एक कमान सी नज़र आ रही है, यहाँ विराजमान है सूर्यदेवता, पूरी जानकारी अगले चिट्ठे में…

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सुरेन्द्रपुरी में त्रिशक्ति

गायत्री माँ और नरसिंह भगवान की मूर्ति के पास है त्रिशक्ति - गजलक्ष्मी, हंसवाहिनी और शेरांवाली

अष्टलक्ष्मी - धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, वर लक्ष्मी, सन्तान लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी में से यहाँ लक्ष्मी जी अपने गज ल्क्ष्मी रूप में है जहाँ दोनों ओर ऐरावत फूलमाला लिए उनके स्वागत में है और कमल आसन पर कलश से स्वर्ण मुद्राएँ गिर रही है।

एक ओर है वीणावादिनी सरस्वती जो हाथों में वीणा लिए हंस पर विराजमान है और दूसरी ओर है शेर की सवारी कर रही माँ दुर्गा -

देख कर ऐसा लग रहा था कि शायद बाद में इसे ही मुख्य मन्दिर का प्रवेश द्वार बनाया जाएगा -

यहाँ तेलुगु में लिखा भी है गुड़ी दारि। तेलुगु में गुड़ी का अर्थ है मन्दिर और मार्ग को दारि कहते है।

यहाँ से आगे बने मन्दिर के कलश तक दीवार पर कतार में शिवलिंग को हार चढाते हाथियों की आकृतियाँ है। कलश के पास तेलुगु में बड़े अक्षरों में मन्दिर का नाम लिखा है - सुरेन्द्रपुरी पंचमुखी

इसी के आगे अंत में शेषनाग पर ब्रह्मा विष्णु महेश की मूर्तियाँ है जो इस समय मन्दिर में भीतर जाने का प्रवेश द्वार है जिसका विवरण अगले चिट्ठे में…

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सुरेन्द्रपुरी में पंचमुखी देव

सुरेन्द्रपुरी में प्रवेश द्वार पर सुरेन्द्र देव की विशाल मूर्ति के पीछे थोड़ी ही दूरी पर है एक विशाल मूर्ति जो पंचमुखी हनुमान जी की है -

यही मूर्ति पीछे से शिवजी के पंचेश्वर रूप की है -

इस चित्र से यहाँ शेष रह गए छोटे पहाड़ भी देखे जा सकते है।

आगे बढ कर हमने देखा दाहिनी ओर (अपनी दाहिनी ओर तथा मन्दिर की बाईं ओर) निर्माण कार्य चल रहा है। सबसे दाहिने मन्दिर के सफ़ेद कलश है जो हनुमान जी के चित्र में देखे जा सकते है। यहाँ हिमालय पर्वत पर शिवजी विराजमान है पर मन्दिर पूरा बना नहीं है।

इसके बाईं ओर भी एक मन्दिर का काम चालू है पर अभी स्पष्ट नहीं है कि कौन सा मन्दिर है। इसके बाईं ओर है विशाल मूर्ति शंख, चक्र, पद्म, गदाधारी पंचमुखी गायत्री माँ की -

जिसके पास ही है नरसिंह भगवान की मूर्ति जो बहुत ही आकर्षक है जैसा कि आप इस चित्र में देख रहे है -

नरसिंह भगवान की जीभ बाहर निकली है जिसके दोनों ओर है नुकीले दाँत। जीभ के भीतरी छोर पर यानि मुख के अन्दर भी एक मूर्ति है जो शायद गणेश जी की है, सामने से तो ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था और पीछे निर्माण कार्य चलने से जा नहीं पाए।

हम बाईं ओर आगे बढते गए और देखते गए जिसकी जानकारी अगले चिट्ठे में…

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