टीपू सुल्तान के जीवन की झलक

श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुल्तान द्वारा बनवाया गया रंगनाथ स्वामी मन्दिर देखने के बाद हम पहुँचे टीपू सुल्तान का म्यूज़ियम देखने।

बस यूँ समझिए पौराणिक काल से निकल कर हम ऐतिहासिक काल में पहुँच गए।

यह संग्रहालय विशाल हरे-भरे परिसर में स्थित है। बीचों-बीच सीधी कतार में रंग-बिरंगे फूलों की बहार भी है जिनमें संग्रहालय के पास लाल-लाल फूल धूप में दमक रहे थे।

संग्रहालय बाहर से सामान्य है पर भीतर पहुँचने पर लगता है जैसे किसी महल में आ गए। दीवारों और छत पर सुनहरी महीन नक्काशी। महीन नक्काशीदार सुनहरी कमानें भी थी।

संग्रहालय में चित्रों के माध्यम से टीपू सुल्तान के जीवन की झलक बताई गई है। जीवन की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं के चित्र है - नन्हें टीपू से लेकर गद्दीनशीं सुल्तान तक और हर चित्र के साथ लिखा है विवरण। पिता हैदर अली, माँ, दादी, अभिन्न मित्र पंडित पूर्णय्या के साथ बिताए पल भी चित्रों में है।

सबसे अच्छा चित्र मुझे लगा क़िले पर दुर्गम चढाई का। बड़े से कैनवैस पर क़िले के ऊपरी छोर से लेकर नीचे ज़मीन तक फैला भाग और क़िले पर कई-कई सैनिक चढाई कर रहे है। सचमुच यह चित्र उस समय के युद्ध की जीवन्त तस्वीर है।

सबसे मार्मिक चित्र है टीपू सुल्तान के दो राजकुमारों को अंग्रेज़ों द्वारा बन्दी बनाए जाने पर टीपू सुल्तान की ओर से सेनापति की गवर्नर से चर्चा का। दोनों राजकुमार सामने खड़े है, उनके सामने बैठे सेनापति गवर्नर से वार्तालाप कर रहे है।

सबसे आकर्षक चित्र है ताजपोशी के बाद गद्दीनशीं टीपू सुल्तान।

एक कक्ष में हथियार प्रदर्शित किए गए है। विभिन्न बादशाहों और राजाओं द्वारा टीपू सुल्तान को भेंट किए गए छोटे-बड़े तुर्की सैनिक हथियार जैसे चाकू, कटार आदि यहाँ रखे गए है। यह छोटे आकार के चाकू टीपू सुल्तान हमेशा अपने पास रखा करते थे। इन्हीं के साथ रखी है टीपू सुल्तान की प्रसिद्ध ऐतिहासिक तलवार।

संग्रहालय देख कर हम बाहर परिसर में आ गए। ऊँचे पेड़ों की छाया में हरियाली पर हाथों में चप्पलें उठाए हम नंगे पैर चलने लगे तभी सुना एक महिला स्वर। नज़रे वहाँ गई तो देखा एक महिला छोटी सी कुर्सी पर बैठी है, हाथ में पुस्तक है, सामने तीन कतार में बच्चे अर्धगोलाकार बैठे है और सुन रहे है।

वाह ! क्या कक्षा है। इस तरह से टीपू सुल्तान का पाठ पढेगें तो फ़ेल होना तो दूर की बात रही बच्चों के तो इतिहास में नम्बर भी कम नहीं होंगें।

और हमें याद आ गई जितेन्द्र की कक्षा। बूँद जो बन गई मोती फ़िल्म में जितेन्द्र क्लास रूम में कविता न पढाकर बच्चों को प्रकृति की गोद में ले आते है और गूँज उठती है मुकेश की आवाज -

हरी भरी वसुन्धरा पे नीला-नीला ये गगन
ये किसके बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन
दिशाएं देखो रंग भरी चमक रही उमंग भरी
ये किसने फूल फूल पे किया श्रृंगार है
ये कौन चित्रकार है

2 Comments »

  1. abha said

    लजवाब पेंटिग देखने के बाद प्रतिक्रिया अच्छी लगी ।

  2. Annapurna said

    धन्यवाद आभा जी !

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