रंगनाथ स्वामी है शेषनाग की शैय्या पर विराजे विष्णु।
श्रीरंगपट्टनम का यह विष्णु मन्दिर टीपू सुल्तान ने बनवाया था। मन्दिर के बाहर भरा-भरा सा बाज़ार है। पूजा की सामग्री मिल रही है जिसमें तुलसीदल की माला प्रमुख है। पूजा की सामग्री लेकर हम भीतर पहुँचे।
भीतर से आज भी यह मन्दिर प्राचीन मन्दिरों में से एक नज़र आता है। पत्थरों से बना है और ऊँची छत होने से यहाँ बहुत ठंडक है और नीम अँधेरा है।
हमने गलियारा पार किया और देखी सामने काले पत्थर से बनी विष्णु की विशाल मूर्ति।
शेषनाग की शैय्या पर विष्णु दाहिनी करवट लेटे है। शान्त मुख मुद्रा। शीर्ष पर शेषनाग के सात फन है। काले पत्थर से शेषनाग का आपस में जुड़ा एक-एक फन स्पष्ट नज़र आ रहा है यहाँ तक कि मुख से निकलने वाले बाल भी साफ़ दिखाई दे रहे थे। बाई ओर से विष्णु के पैर दबाती लक्ष्मी की छोटी सी मूर्ति।
दर्शन कर हम जैसे ही परिधि से बाहर आए तो देखा दाहिनी ओर छोटी तीन मूर्तियाँ - राम, लक्ष्मण और सीता की।
बाहर निकलते समय द्वार पर प्रसाद बिक रहा था। हमने दस रूपए दिए तो उसने एक लिफ़ाफ़े में पाँच लड्डू रख कर हमें दिए। हमने बाहर आकर जैसे ही लिफ़ाफ़ा खोल कर लड्डू को हाथ लगाया लड्डू भरभरा कर टूट गए। हमें आश्चर्य हुआ शक्कर मिलाकर रवे से बनाए गए ये लड्डू इतनी कोमलता से कैसे उसने सहेज कर लिफ़ाफ़े में रखे कि एकदम गोल और साबुत थे और हमारे छूने भर से ही भरभरा गए…
यह स्वादिष्ट प्रसाद ग्रहण कर हम आगे बढ गए।
