बैंग्लोर का मशहूर लाल बाग़ देख कर बाहर निकलते-निकलते अँधेरा घिर आया था। ट्रैफ़िक भी बहुत बढ गई थी। हम पहुँचे नन्दी मन्दिर। बहुत ही व्यस्त सड़क पर है नन्दी मन्दिर।
यहाँ अपना सामान रखने की व्यवस्था नहीं थी हमने सोचा भीतर कैमरा और सेलफोन ले जाने नहीं देंगें इसीलिए हमने यह सब गाड़ी में ही रख दिया और हमें मन्दिर के पास उतार कर गाड़ी बहुत आगे बढ गई पार्किंग के लिए। नतीजा ये हुआ कि हम एक भी तस्वीर नहीं ले पाए जबकि हमने देखा कि कुछ लोग सेलफोन के कैमरे से परिसर में तस्वीरें ले रहे थे।
यहाँ तीन जगह दर्शन करने थे - पहले गणपति फिर बाल हनुमान फिर मुख्य मन्दिर में नन्दी के आकार का शिवलिंग
मन्दिर का परिसर है तो बड़ा और दो द्वार भी है पर बाएँ द्वार से भीतर जाते ही पूजा की सामग्री बेचते लोग बैठे है और थोड़ा आगे बढते ही सामने विराजमान है गणपति। सड़क से भी गणपति के दर्शन किए जा सकते है।
सड़क अधिक चौड़ी नहीं है और सड़क के दूसरी ओर से भी गणपति नज़र आ रहे थे। पर सड़क इतनी व्यस्त और मन्दिर में बढती भीड़ से हम लौटते समय भी गणपति की तस्वीर नहीं ले पाए जबकि हमारा बहुत मन था और हमने कोशिश भी बहुत की थी। आखिर मूर्ति इतनी सुन्दर जो थी।
बड़ी पीली मूर्ति जिसकी सूँड और दोनों हाथों पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर लगभग चार इंच के लाल, नीला, हरा, जामुनी जैसे गहरे रंगों के चकते से लगे थे जो ऐसे लग रहे थे मानो रेशमी साड़ी की बार्डर के टुकड़े हो। जब दर्शन के लिए पास गए तो देखा कि यह पेन्टिंग है जिस तरह आँखों और माथे पर तिलक के लिए पेन्टिंग की जाती है वैसी ही कलाकारी थी। वास्तव में तारीफ़ उस कलाकार की।
दर्शन के बाद परिक्रमा के लिए बहुत बड़ा स्थान। बाईं ओर से कुछ सीढियाँ चढना और फिर चलते हुए परिक्रमा करते हुए दाहिनी ओर फिर सीढियाँ उतरते हुए परिक्रमा पूरी करना। उस स्थान की चौड़ाई इतनी कि एक साथ भीड़ की भीड़ परिक्रमा कर सकें।
इस तरह बाईं ओर गणपति के दर्शन के बाद हम परिसर में आगे बढे और गणपति मंदिर के लगभग पीछे देखा बाल हनुमान का मन्दिर। हमनें पहली बार देखा बाल हनुमान का मन्दिर।
हनुमान जी का स्मरण करने से ही हम एक ऐसी मूर्ति की कल्पना करते है जिस पर तेल चढा है और सिन्दूर पुता है। लेकिन यह तो बाल हनुमान है इसीलिए मूर्ति काले पत्थर की है।
छोटा सा सलोना मुखड़ा बैठे हुए बाल हनुमान का वैसे बैठे हुए दिखते नहीं है सिर्फ़ अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। मुखड़े के चारों ओर पान के बीड़ों की मालाएँ। कुल पाँच मालाएँ थी। आमतौर पर होता यह है कि मालाएँ एक के ऊपर एक या एक दूसरे में उलझी होती है पर यहाँ व्यवस्थित रूप से मुखड़े के गोलाकार कुछ दूरी बनाए रखते हुए थी। अंतिम दो मालाओं के बीच से सामने की ओर पूँछ निकली थी।
यह मन्दिर परिसर का पिछला भाग था। यहाँ से दूसरी ओर यानि मन्दिर में दाहिनी ओर मुख्य मन्दिर है जो नन्दी मन्दिर है। यहाँ नन्दी के आकार में शिवलिंग है। मूर्ति के एकदम निचले भाग में देखने पर लगेगा नन्दी विराजमान है पर नज़र थोड़ा ऊपर उठाने पर शिवलिंग देख सकते है। पूरी दृष्टि में बीच में शिवलिंग और दोनों किनारों के आकार नन्दी के मुखड़े और पूँछ से लगेंगे।
बहुत अच्छा लगा हमें यह अनूठा नन्दी मन्दिर देखना और इसी के साथ हमारी बैंग्लोर की यात्रा समाप्त हुई। हमने रात का खाना खाया और तान कर सो गए क्योंकि दूसरे दिन सुबह जल्दी ही हमें रवाना होना था मैसूर।
दिनेशराय द्विवेदी said
अच्छा विवरण। चित्र होते तो सोनें में सुहागा होता।
समीर लाल said
अच्छा लगा यह विवरण पढ़कर. द्विवेदी जी से सहमत हूँ-चित्र से चार चाँद लग जाते.
आभार इस वृतांत के लिये.
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आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.
एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.
शुभकामनाऐं.
-समीर लाल
(उड़न तश्तरी)
Annapurna said
धन्यवाद दिनेश राय जी, समीर जी !