बैंग्लोर में तकनीकी संग्रहालय देखने के बाद हमारा ख़रीददारी का कार्यक्रम था। ख़रीदने के लिए यहाँ की ख़ास दो ही चीज़े है - रेशम और चन्दन
यहाँ की रेशम की पारम्परिक साड़ियाँ सभी को बहुत अच्छी लगती है। प्यूर सिल्क की साड़ियाँ बहुत ही मुलायम होती है। पारम्परिक नमूने में यह बहुत अच्छी लगती है जैसे सादी (प्लेन) साड़ी पर चार इंच की बार्डर और बार्डर की ही तरह पल्लू। कुछ साड़ियों में बीच में बूटे भी है। इन साड़ियों के दाम ढाई तीन हज़ार रूपए से शुरू होते है।
इसके अलावा हल्के रेशम की साड़ियाँ भी थी जो कम मुलायम थी मगर अच्छी थी। डिज़ाइन भी प्यूर सिल्क की साड़ियों की तरह ही थे। यह साड़ियाँ 400 से लेकर 1200 रूपए तक मिल जाती है।
इस तरह की हल्की रेशमी साड़ियाँ छोटे-छोटे कारख़ानों में भी तैयार होती है। ऐसे कारख़ाने कुछ लोग अपने घर में भी चलाते है। एक ऐसा ही कारख़ाना हमने देखा जहाँ एक कमरे में चार कोनों पर फ्रेम लगे है जिन पर साड़ी बुनी जा रही है। एक फ्रेम देखिए जहाँ कामगार साड़ी बुन रहा है -
सामने रेशमी धागे लटक रहे है। जो गहरा रंग दिखाई दे रहा है वो बुनी हुई साड़ी है और आगे लम्बे धागे है जिस पर धागों की आड़ी बुनाई कर साड़ी बुनी जा रही है।
रेशमी साड़ियों के अलावा कर्नाटक की दूसरी ख़ास चीज़ है चन्दन और चन्दन से बनी मूर्तियाँ।
चन्दन का उपयोग शुभ कार्यों में किया जाता है। दक्षिण में और जहाँ तक मेरी जानकारी है मुस्लिम समुदाय में भी शुभ कार्यों में महिलाएं इसे एक-दूसरे की गर्दन पर लगाती है। मुस्लिम समुदाय में शायद इसे सन्दल के नाम से जाना जाता है।
चन्दन पूजा सामग्री है। विशेषकर अक्षय तृतीया पर महादेव जी का श्रृंगार चन्दन से किया जाता है। चन्दन का पाउडर यहाँ पैकेटों में बिक रहा था। 100 ग्राम का पैकेट 100 रूपए में।
चन्दन सौन्दर्य का साथी भी है। पुराने ज़माने में हल्दी चन्दन के ही तो लेप उबटन लगाए जाते थे। यहाँ भी चन्दन के फेस पैक बहुत बिक रहे थे। 100 ग्राम के फेस पैक का डिब्बा 150 रूपए में।
चन्दन की जप करने की मालाएँ भी छोटे-बड़े सभी आकार के मनकों की बिक रही थी।
चन्दन की मूर्तियाँ एक इंच से लेकर पाँच फीट तक हमने देखी। गणपति, शिव, कृष्ण और रधाकृष्ण की ही मूर्तियाँ हमने देखी। बहुत सुन्दर मूर्तियाँ जिनकी कीमत आकार के अनुसार आठ-नौ लाख रूपए तक थी।
मूर्तियों के अलावा चन्दन की लकड़ी से बने ख़ूबसूरत झूले भी थे। एक झूले की कीमत तो बारह लाख रूपए तक थी।
इसके अलावा और कुछ ख़ास चीज़ वहाँ के बाज़ारों में हमने नहीं देखी। शेष वही था जो हमें हैदराबाद में भी मिल जाता है। बाज़ार का चक्कर लगाते-लगाते धूप भी कम हो गई थी और हम बढ गए आगे लाल बाग़ की ओर।

mehek said
sadiyon ki jankar wah,wo bhi resham ki,bahut khub,chandan ki to baat hi nirali hai,bahut rochak jankari.
समीर लाल said
बड़ी रोचक जानकारी दी है. आभार.
Annapurna said
धन्यवाद समीर जी महक जी !