Archive for May, 2008

मैसूर पैलेस

फिलोमिना चर्च देखने के बाद हमने दोपहर का भोजन किया। अब कार्यक्रम था महल देखने का यानि मैसूर का मशहूर पैलेस।

यह राजमहल मैसूर के कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ का है। यह पैलेस बाद में बनवाया गया। इससे पहले का राजमहल चन्दन की लकड़ियों से बना था। एक दुर्घटना में इस राजमहल की बहुत क्षति हुई जिसके बाद यह दूसरा महल बनवाया गया।

पहले महल को बाद में ठीक किया गया जहाँ अब संग्रहालय है। हम पहुँचे इस दूसरे महल को देखने जो ज्यादा बड़ा और अच्छा है। यह है प्रवेश द्वार -

प्रवेशद्वार से भीतर जाते ही मिट्टी के रास्ते पर दाहिनी ओर एक काउंटर है जहाँ कैमरा और सेलफोन जमा करना है। इसका तरीका हमें बहुत अच्छा लगा।

कैमरा और सेलफोन लेकर वो उसे एक लाँकर में रख देते है और उस लाँकर की चाभी आपको दे देते है। हर पर्यटक का एक लाँकर और हर सेलफोन और कैमरे के लिए शुल्क पाँच रूपए। यह मैनें पहली बार देखा।

काउंटर के पास है सोने के कलश से सजा मन्दिर -

दूसरे छोर पर भी ऐसा ही एक मन्दिर है जो नीचे दी गई तस्वीर में दूर धुँधला सा नज़र आ रहा है यानि दोनों छोरों पर है मन्दिर जो मिट्टी के रास्ते पर है और विपरीत दिशा में है महल का मुख्य भवन तथा बीच में है उद्यान -

महल की इस तस्वीर को देखिए जिसमें बाईं ओर कम ऊँचाई का जो अहाता नज़र आ रहा है वहीं है महल के भीतर जाने का प्रवेश द्वार पर यहाँ बड़े से काउंटर पर जूते-चप्पल रखवाने है और नंगे पैर महल के भीतर जाना है -

भीतर हम पहुँचे विशाल कक्ष में जिसके किनारों के गलियारों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्तम्भ है। इन स्तम्भों और छत पर बारीक सुनहरी नक्काशी है। दीवारों पर क्रम से चित्र लगे है। हर चित्र पर विवरण लिखा है।

कृष्णराजा वाडियार परिवार के चित्र। राजा चतुर्थ के यज्ञोपवीत संस्कार के चित्र। विभिन्न अवसरों पर लिए गए चित्र। राजतिलक के चित्र। सेना के चित्र। राजा द्वारा जनता की फ़रियाद सुनते चित्र। एक चित्र पर हमने देखा प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा का नाम लिखा था। लग रहा था लगभग सभी चित्र रवि वर्मा ने ही तैयार किए।

चित्रों में मैसूर का दशहरा उत्सव दर्शाया गया है। पहले चित्र में सामने एक ऊँट पर मंत्री झंडा लिए है जिसका अर्थ है कि राजा का जुलूस आ रहा है। मुख्य चित्र तो बहुत ही बड़ा और बहुत सुन्दर है जिसमें हाथी पर सिंहासन पर राजा विराजमान है साथ में जनता का हुजूम चल रहा है और घरों की खिड़कियों से महिलाएँ झाँक कर जुलूस देख रही है।

कक्ष के बीचों-बीच छत नहीं है और ऊपर तक गुंबद है जो रंग-बिरंगे काँचों से बना है। ऐसे लग रहा था इन रंग-बिरंगे काँचों का चुनाव सूरज और चाँद की रोशनी को महल में ठीक से पहुँचाने के लिए किया गया था।

निचला विशाल कक्ष देखने के बाद हम सीढियाँ चढते हुए पहले तल पर पहुँचे। सीढियाँ इतनी चौड़ी कि एक साथ बहुत से लोग चढ सकें। वैसे उस दिन वहाँ भीड़ भी बहुत थी जिनमें स्थानीय लोग भी बहुत नज़र आए।

पहला तल पूजा का स्थान लगा। यहाँ सभी देवी-देवताओं के चित्र लगे थे। साथ ही महाराजा और महारानी द्वारा यज्ञ और पूजा किए जाने के चित्र लगे थे। बीच का गुंबद यहाँ तक था।

फिर हम पहुँचे दूसरे तल पर जो दरबार हाँल है। बीच के बड़े से भाग को चारों ओर से कई सुनहरे स्तम्भ घेरे थे। इस घेरे से बाहर बाएँ और दाएँ गोलाकार स्थान है। शायद एक ओर महारानी और दरबार की अन्य महिलाएँ बैठा करतीं थी और दूसरी ओर से शायद जनता की फ़रियाद सुनी जाती थी क्योंकि यहाँ से बाहरी मैदान नज़र आ रहा था और बाहर जाने के लिए दोनों ओर से सीढियाँ भी है जहाँ अब बाड़ लगा दी गई है।

इसी तल पर पिछले भाग में एक छोटे से कक्ष में सोने के तीन सिंहासन है - महाराजा, महारानी और युवराज के

आज भी इतना आकर्षक है यह महल -

तो उस समय कैसा रहा होगा यही सोचते हुए हम बाहर निकल आए।

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फिलोमेना चर्च

टीपू सुल्तान के महल से निकल कर हम पहुँचे फिलोमेना चर्च जो मैसूर के पुराने चर्चों में से एक है और शायद सबसे पुराना चर्च है।

व्यस्त सड़क पर बड़े परिसर में स्थित है यह चर्च। भव्य इमारत है चर्च की जिसकी मीनार भी बहुत ऊँची है जो हमारे कैमरे में समा न सकी -

बाहर अधखिले लाल गुलाब और छोटी पतली रंग-बिरंगी मोमबत्तियाँ बिक रही थी। मोमबत्ती और गुलाब सभी का दाम एक-एक रूपया।

हमने भी गुलाब और मोमबत्तियाँ खरीदी और चल पड़े चर्च के भीतर। बड़ा हाँल जिसमें नीम अँधेरा पहरा था और वातावरण बहुत शान्त था। बीच में बिछी सारी बेंचें लगभग खाली थी। इक्का-दुक्का लोग बैठे प्रार्थना कर रहे थे।

हम बाईं ओर बढे जहाँ यीशू को गोद में लिए मदर मैरी की प्रतिमा थी। हमने मदर के चरणों में गुलाब रखें। मोमबत्तियाँ जलाई और प्रार्थना की।

आगे यीशू के जन्म और बाल्यकाल की कहानी कहते सुन्दर चित्र क्रम से सजे थे जिन्हें देखते हुए हम आगे बढते गए और आ गए बीचों-बीच जहाँ प्रभु यीशु की विशाल प्रतिमा थी जिसके आगे हमने शीश झुकाया और दाहिनी ओर आ गए।

दाहिनी ओर ईसा-मसीह के बलिदान की कहानी कहते चित्र क्रम से लगे थे। हर चित्र के आगे लिखा था विवरण - शरीर पर पड़ते कोड़े, पहली बार बेहोश होना, अपना सलीब उठा कर चलना, शरीर पर लगने वाली पहली कील, फिर दूसरी, तीसरी… और सलीब पर ईसा…

फिर हम बीच में रखी बेंचों पर कुछ देर बैठे रहे। दुबारा बीचों-बीच लगी प्रभु यीशू की प्रतिमा के पास आए। यहाँ से कुछ सीढियाँ नीचे जा रही थी।

नीचे सीढियाँ उतरते ही देखा सामने फिलोमेना की बड़ी प्रतिमा जो काँच के आवरण में थी। दाहिनी करवट लेटी फिलोमेना के सामने एक शिशु था। बहुत सुन्दर गुलाबी मूरत जिसे हम कुछ पल निहारते रह गए।

फिर दाहिनी ओर गलियारे में चल पड़े जहाँ नीम अँधेरा था। गलियारे में बोर्ड पर कई-कई नाम थे जो उनके थे जिन्होनें समय-समय पर इस चर्च को किसी न किसी रूप में योगदान दिया था। गलियारा पार कर कुछ सीढियाँ चढ हम बाहर परिसर में आ गए। कुछ देर परिसर के शान्त वातावरण में रूकने के बाद हम बाहर निकल आए।

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शेर-ए-दक्कन टीपू सुल्तान

हम उस टीपू सुल्तान के महल में घूम रहे थे जिसे शेर-ए-दक्कन का ख़िताब दिया गया था।

टीपू सुल्तान की जाँबाज़ी के बहुत से क़िस्से है जिनमें से एक है उनकी शेर से लड़ाई। एक बार शिकार के दौरान जंगल में टीपू सुल्तान के सामने शेर आ गया और एक जाँबाज़ सिपाही की तरह टीपू सुल्तान उससे भी भिड़ गए।

जिन्होनें बहुत पहले दूरदर्शन पर संजय ख़ान का धारावाहिक द सोर्ड आँफ टीपू सुल्तान देखा हो उन्हें याद होगा कि इस घटना को संजय ख़ान पर बहुत अच्छी तरह से फ़िल्माया गया था। पर्यटकों के लिए बेचे जा रहे चित्रों में भी एक चित्र ऐसा है जिसमें टीपू सुल्तान को शेर से लड़ता हुआ दिखाया गया है।

यही सब देखते जानते शहर हो चुके महल में हम वाटर हाउज़ यानि स्नानघर देख कर थोड़ा ही आगे बढे कि हमने देखा यह बोर्ड लगा था

यही वह स्थल है जहाँ अंग्रेज़ों ने उस पर फायर किया था और टीपू सुल्तान के मृत शरीर को यहीं छोड़ गए थे। जहाँ उनकी मृत देह मिली उस स्थान को रेखांकित किया गया है -

यहाँ एक पत्थर लगा है जिस पर अंग्रेज़ी में खुदा है कि टीपू सुल्तान का मृत शरीर यहाँ पाया गया - द बाँडी आँफ टीपू सुल्तान वाज़ फाउंड हियर

हम सोचने लगे कि इतिहास का वह क्या पल रहा होगा जब सैनिक अपने सुल्तान को ढूंढते हुए वहाँ पहुँचे और वहाँ पाया अकेला पड़ा मृत शरीर उस सुल्तान का जो शेर से अकेला ही भिड़ गया था पर अपने आपको अंग्रेज़ सैनिकों से नहीं बचा पाया।

वहाँ से थोड़ा ही आगे बढने पर कमान नज़र आई जो कभी महल का द्वार हुआ करती थी। जैसा पहले होता था हर महल के चार दिशाओं में चार द्वार हुआ करते थे। और हम इस कमान से, महल के इस द्वार से बाहर निकल आए और आगे बढ गए मैसूर की ओर।

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