फिलोमिना चर्च देखने के बाद हमने दोपहर का भोजन किया। अब कार्यक्रम था महल देखने का यानि मैसूर का मशहूर पैलेस।
यह राजमहल मैसूर के कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ का है। यह पैलेस बाद में बनवाया गया। इससे पहले का राजमहल चन्दन की लकड़ियों से बना था। एक दुर्घटना में इस राजमहल की बहुत क्षति हुई जिसके बाद यह दूसरा महल बनवाया गया।
पहले महल को बाद में ठीक किया गया जहाँ अब संग्रहालय है। हम पहुँचे इस दूसरे महल को देखने जो ज्यादा बड़ा और अच्छा है। यह है प्रवेश द्वार -
प्रवेशद्वार से भीतर जाते ही मिट्टी के रास्ते पर दाहिनी ओर एक काउंटर है जहाँ कैमरा और सेलफोन जमा करना है। इसका तरीका हमें बहुत अच्छा लगा।
कैमरा और सेलफोन लेकर वो उसे एक लाँकर में रख देते है और उस लाँकर की चाभी आपको दे देते है। हर पर्यटक का एक लाँकर और हर सेलफोन और कैमरे के लिए शुल्क पाँच रूपए। यह मैनें पहली बार देखा।
काउंटर के पास है सोने के कलश से सजा मन्दिर -
दूसरे छोर पर भी ऐसा ही एक मन्दिर है जो नीचे दी गई तस्वीर में दूर धुँधला सा नज़र आ रहा है यानि दोनों छोरों पर है मन्दिर जो मिट्टी के रास्ते पर है और विपरीत दिशा में है महल का मुख्य भवन तथा बीच में है उद्यान -
महल की इस तस्वीर को देखिए जिसमें बाईं ओर कम ऊँचाई का जो अहाता नज़र आ रहा है वहीं है महल के भीतर जाने का प्रवेश द्वार पर यहाँ बड़े से काउंटर पर जूते-चप्पल रखवाने है और नंगे पैर महल के भीतर जाना है -
भीतर हम पहुँचे विशाल कक्ष में जिसके किनारों के गलियारों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्तम्भ है। इन स्तम्भों और छत पर बारीक सुनहरी नक्काशी है। दीवारों पर क्रम से चित्र लगे है। हर चित्र पर विवरण लिखा है।
कृष्णराजा वाडियार परिवार के चित्र। राजा चतुर्थ के यज्ञोपवीत संस्कार के चित्र। विभिन्न अवसरों पर लिए गए चित्र। राजतिलक के चित्र। सेना के चित्र। राजा द्वारा जनता की फ़रियाद सुनते चित्र। एक चित्र पर हमने देखा प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा का नाम लिखा था। लग रहा था लगभग सभी चित्र रवि वर्मा ने ही तैयार किए।
चित्रों में मैसूर का दशहरा उत्सव दर्शाया गया है। पहले चित्र में सामने एक ऊँट पर मंत्री झंडा लिए है जिसका अर्थ है कि राजा का जुलूस आ रहा है। मुख्य चित्र तो बहुत ही बड़ा और बहुत सुन्दर है जिसमें हाथी पर सिंहासन पर राजा विराजमान है साथ में जनता का हुजूम चल रहा है और घरों की खिड़कियों से महिलाएँ झाँक कर जुलूस देख रही है।
कक्ष के बीचों-बीच छत नहीं है और ऊपर तक गुंबद है जो रंग-बिरंगे काँचों से बना है। ऐसे लग रहा था इन रंग-बिरंगे काँचों का चुनाव सूरज और चाँद की रोशनी को महल में ठीक से पहुँचाने के लिए किया गया था।
निचला विशाल कक्ष देखने के बाद हम सीढियाँ चढते हुए पहले तल पर पहुँचे। सीढियाँ इतनी चौड़ी कि एक साथ बहुत से लोग चढ सकें। वैसे उस दिन वहाँ भीड़ भी बहुत थी जिनमें स्थानीय लोग भी बहुत नज़र आए।
पहला तल पूजा का स्थान लगा। यहाँ सभी देवी-देवताओं के चित्र लगे थे। साथ ही महाराजा और महारानी द्वारा यज्ञ और पूजा किए जाने के चित्र लगे थे। बीच का गुंबद यहाँ तक था।
फिर हम पहुँचे दूसरे तल पर जो दरबार हाँल है। बीच के बड़े से भाग को चारों ओर से कई सुनहरे स्तम्भ घेरे थे। इस घेरे से बाहर बाएँ और दाएँ गोलाकार स्थान है। शायद एक ओर महारानी और दरबार की अन्य महिलाएँ बैठा करतीं थी और दूसरी ओर से शायद जनता की फ़रियाद सुनी जाती थी क्योंकि यहाँ से बाहरी मैदान नज़र आ रहा था और बाहर जाने के लिए दोनों ओर से सीढियाँ भी है जहाँ अब बाड़ लगा दी गई है।
इसी तल पर पिछले भाग में एक छोटे से कक्ष में सोने के तीन सिंहासन है - महाराजा, महारानी और युवराज के
आज भी इतना आकर्षक है यह महल -
तो उस समय कैसा रहा होगा यही सोचते हुए हम बाहर निकल आए।








