बैंग्लूर का लाल बाग़

पिछले सप्ताह मैं बैंग्लूर और मैसूर घूमने गई थी। वहाँ लिए गए कुछ चित्र और जानकारी आपसे बाँटना चाहती हूँ।

सबसे पहले हम बैंग्लूर पहुँचे। वहाँ भी गर्मी वैसी ही रही जैसी हैदराबाद में थी, 38 डिगरी के आसपास। पहला अनुभव यही हुआ कि बैंग्लूर का मौसम भी बिगड़ गया है। सुना था यहाँ धूप तेज़ नहीं होती और हमेशा सुहावना मौसम रहता है, तो यह भ्रम टूट गया।

दूसरा भ्रम टूटा बैंग्लूर की सड़को का। सुना था बहुत चौड़ी सड़के है पर इतना ट्रैफिक की सड़के भी संकरी लगने लगी। कोई भी सिग्नल हम बिना रूके पार नहीं कर पाए।

शाम के समय हम पहुँचे लाल बाग़ जो एक व्यस्त सड़क पर है। भीतर पहुँचते ही हमने पहली यह तस्वीर ली जिसे देख कर आपको पता चलेगा कि हम पाँच बजने में पाँच मिनट कम रहने पर वहाँ पहुँचे।

पहली नज़र में तो लगा ही नहीं कि यह वास्तविक घड़ी है। फिर एचएमटी के बैनर के सामने इसका गहरा लाल सेकेण्ड का काँटा घूमते देखा। लकड़ी की तरह लगने वाले दोनों काँटे समय बता रहे थे। काँटों पर किसी तरह का फ्रेम नहीं।

हरियाली पर यह घड़ी बराबर चल रही थी और हरियाली देख कर लग रहा था कि यहाँ नियमित पानी दिया जाता है। किस धातु के बने है यह वाटर प्रूफ काँटे और हरियाली के नीचे दबी मशीन कैसे जुड़ी है इसकी तकनीकी जानकारी देने वाला वहाँ कोई नहीं था। किसी बोर्ड पर भी नहीं लिखा था। पास से भी इसे नहीं देखा जा सकता। एक निश्चित दूरी पर बाड़ बनी है इसी से इसे छू कर भी कुछ जाना नहीं जा सका।

240 एकड़ में फैले इस बाग़ में जगह-जगह फव्वारे लगे है। इस फव्वारे के पीछे दोनों ओर है बोनसई गार्डन जिसमें ऊँचे-ऊँचे पेड़ निश्चित दूरी पर लगे है जिससे यह सैर करने वाले बगीचे के साथ वनस्पति शास्त्र की जानकारी देने वाला उद्यान भी लगा। निश्चित रूप से यह वैज्ञानिक सलाह पर बना है।

इसके दाहिनी ओर लोटस गार्डन है यानि कमल की बहार। यहाँ एक बात हम आपको बता दे कि बाग़ कहने से जिस तरह फूलों के बहार की हम कल्पना करते है वो रंग-बिरंगी बहार यहाँ नज़र नहीं आई पर चारों ओर हरियाली थी।

आगे बढने पर एक और वैज्ञानिक दृष्टि। ग्रीन हाउज़ का नाम सुना होगा जिसकी दीवारें और छत काँच से बने होते है जिससे छन कर आने वाले प्रकाश में पौधों पर विभिन्न शोध किए जाते है।

ऐसा ही यह काँच का गलियारा है पर इसमें पौधे नहीं है। बीच में से गुज़र भी नहीं सकते।

यह बाग़ इतना लंबा चौड़ा है कि इसमें कुछ-कुछ सड़कों जैसा भी है। दोनों किनारों पर हरियाली, ऊँचे पेड़ और बीच में सड़क। शायद इसीलिए इस सड़क का नाम है ठंडी सड़क।

मैं चौंक गई यहाँ आ कर। बोर्ड पर ऊपर कन्नड़ भाषा में और नीचे अंग्रेज़ी में लिखा है ठंडी सड़क। शब्द हिन्दी का है पर हिन्दी में लिखा नहीं है। शायद इस जगह के लिए हिन्दी में ही उपयुक्त शब्द है।

मुझे अचानक यहाँ याद आ गया कि 14 वीं सदी में कर्नाटक में सरकारी काम-काज हिन्दी में होता था। आज भी हिन्दी लोकप्रिय है और कुछ ऐसे निशां हिन्दी प्रेम की गवाही देते है।

सबसे पीछे बीच में हरियाली समाप्त होती है और पत्थरों का टीला है जहाँ सबसे ऊपर चार पत्थर है। माना जाता है यह पत्थर सबसे पुराने पत्थरों में से है। इस टीले से नीचे पूरा शहर नज़र आता है।

बाग़ में बीच में आइसक्रीम, चिप्स जैसी चीज़ें भी खरीद कर खाई जा सकती है। यानि एक लम्बा समय आप यहाँ आराम से गुज़ार सकते है।

3 Comments »

  1. शुक्रिया इस विवरण के लिए। चित्र बढ़िया आए हैं।
    सही कहा आपने । बैंगलोर का ट्राफिक तो अझेल है.

  2. Annapurna said

    शुक्रिया मनीष जी

  3. बहुत सुन्दर चित्रण.

RSS feed for comments on this post · TrackBack URI

Leave a Comment