बैंग्लोर का यह शिव मन्दिर पुराना नहीं है। अभी भी लगता है यहाँ निर्माण कार्य जारी है। यह मन्दिर चौबीस घण्टे खुला रहता है।
व्यस्त सडक पर एक छोटी संकरी गली में आगे बढने पर विशाल वृक्ष की छाया में पूजा की सामग्री बिक रही थी। सामग्री ख़रीद कर ठंडी छाया से होकर निकलने पर सामने बायीं ओर सीढियाँ नज़र आती है। सीढियों के पास ही नल लगे है जहाँ से पैर धोकर हम सीढियाँ चढने लगे।
सीढियाँ चढते हुए देखी सामने विशाल गणपति की मूर्ति। लगभग दस सीढियाँ चढ कर हम मूर्ति के पास पहुँचे जहाँ से दाहिनी ओर उतनी ही सीढियाँ उतरनी थी जो मन्दिर के परिसर में समाप्त होती थी।
परिसर में आते ही सामने देखें कैलाश पर्वत पर विराजमान शिव जी। वैसे यह गणपति की मूर्ति के पास आने पर ही दिखाई देने लग गए थे जिसे सीढियाँ उतरते-उतरते भी देखा जा सकता है।
परिसर में बाईं ओर से एक गुफ़ा में ज्योतिर्लिंग यात्रा है जिसके लिए टिकट है। गुफ़ा के पास ही मेज़-कुर्सी लगा कर बैठे कर्मचारी से टिकट लेकर हम गुफ़ा में गए। गुफ़ा में भीतर जाते ही नारायण-नारायण का चिर परिचित नारदजी का स्वर सुनाई देने लगता है।
गुफ़ा में दाहिनी ओर एक के बाद एक अलग-अलग खण्डों में क्रम से लगे ज्योतिर्लिग देखें। हर ज्योतिर्लिंग पर अंग्रेज़ी में विवरण लिखा है जिसमें ज्योतिर्लिंग का नाम, स्थान और विशेषताएं बताई गई है। मुख्य ज्योतिर्लिंग के साथ छोटे आकार के शिव लिंग भी आस-पास रखे है।
चौथा ज्योतिर्लिंग है - मल्लिकार्जुन स्वामी जो आन्ध्र प्रदेश में श्रीशैलम मे स्थित है जिसकी यात्रा हम कर चुके है। शेष एक भी ज्योतिर्लिंग हमारा देखा हुआ नहीं था और यहीं पर हमने पहली बार देखा।
छठे-सातवें ज्योतिर्लिंग से गुज़रते हुए गुफ़ा दाहिनी ओर मुड़ने लगती है और इसी मोड़ पर बाईं ओर नारदजी की आदमकद मूर्ति है जहाँ से हरिजाप सुनाई दे रहा था।
गुजरात के सोमनाथ से लेकर राजस्थान, महाराष्ट्र हर जगह के ज्योतिर्लिंग देखें पर सबसे आकर्षक लगा अमरनाथ का हिम ज्योतिर्लिंग। सफ़ेद जगमगाता हुआ बर्फ़ का बना शिवलिंग।
हालांकि दोपहर बारह बजे का समय था और गर्मी का मौसम फिर भी इस हिम शिवलिंग के आसपास भी पानी की एक बूँद भी नज़र नहीं आई जिससे बर्फ़ के पिघलने का अहसास हो। हमने छुआ पर बर्फ़ पर अधिक देर हाथ नहीं रख पाए। ज्योतिर्लिंग यात्रा की समाप्ति पर बाईं ओर शिव की आदमकद मूर्ति है।
इस गुफ़ा में इलेक्ट्रानिक व्यवस्था अच्छी है। गुफ़ा में नीम अँधेरा है और ज्योतिर्लिंगों पर तेज़ रोशनी। नारदमुनी के हरिजाप के बारे में हम बता ही चुके है। शिव की मूर्ति का दाहिनी हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। यह हाथ धीरे-र्धीरे ऊपर उठता है और नीचे आकर बीच में रूकता है फिर ऊपर उठने लगता है जिससे यदि कुछ सेकेण्डों के लिए आप मूर्ति के सामने खड़े हो जाए तो लगेगा कि शिवजी आपको आशीर्वाद दे रहे है।
गुफ़ा से बाहर आते ही द्वार पर ही गणपति की मूर्ति है और वहीं कैलाश पर्वत पर विराजमान है शिव। आगे बढने पर छोटे से कलश में रखी है गरम भस्म जिसका हमनें टीका किया फिर आ गए परिसर में।
परिसर में दर्शकों की कतारों के कटघरें में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पीतल के छोटे कलश लगे है। जैसा कि सभी जानते है इस तरह की कतारें यू टर्न में होती है और पास-पास लगे यू टर्नों में लगातार लगे यह कलश बहुत सुन्दर लग रहे थे। ऐसा मैनें पहली बार इसी मन्दिर में देखा।
यहाँ भी भीड़ अधिक नहीं थी और हम जल्दी ही दर्शन के लिए आगे बढ गए। दर्शन के लिए रखी थी शिवजी की चाँदी की मूर्ति। दर्शन के बाद बाहर किनारे पूजा के लिए शिवलिंग स्थापित है। जैसा कि चलन है शिवजी की मूर्ति के दर्शन किए जाते है और पूजा शिवलिंग की होती है।
आभिषेक के लिए वहीं पर गिलासों में दूध बेचा जा रहा था। एक गिलास दूध की कीमत दस रूपए थी। हमनें भी दूध लेकर शिवलिग का अभिषेक कर पूजा की।
पूजा के बाद बाहर आने के लिए रास्ता दूसरी ओर से है जहाँ छोटा सा बाज़ार लगा है जैसा कि आमतौर पर मन्दिरों के पास होता है। बाज़ार की रौनक देखते हुए हम बाहर निकले और दोपहर के भोजन के लिए चल पढे।




