Archive for April, 2008

बैंग्लोर का शिव मन्दिर

बैंग्लोर का यह शिव मन्दिर पुराना नहीं है। अभी भी लगता है यहाँ निर्माण कार्य जारी है। यह मन्दिर चौबीस घण्टे खुला रहता है।

व्यस्त सडक पर एक छोटी संकरी गली में आगे बढने पर विशाल वृक्ष की छाया में पूजा की सामग्री बिक रही थी। सामग्री ख़रीद कर ठंडी छाया से होकर निकलने पर सामने बायीं ओर सीढियाँ नज़र आती है। सीढियों के पास ही नल लगे है जहाँ से पैर धोकर हम सीढियाँ चढने लगे।

सीढियाँ चढते हुए देखी सामने विशाल गणपति की मूर्ति। लगभग दस सीढियाँ चढ कर हम मूर्ति के पास पहुँचे जहाँ से दाहिनी ओर उतनी ही सीढियाँ उतरनी थी जो मन्दिर के परिसर में समाप्त होती थी।

परिसर में आते ही सामने देखें कैलाश पर्वत पर विराजमान शिव जी। वैसे यह गणपति की मूर्ति के पास आने पर ही दिखाई देने लग गए थे जिसे सीढियाँ उतरते-उतरते भी देखा जा सकता है।

परिसर में बाईं ओर से एक गुफ़ा में ज्योतिर्लिंग यात्रा है जिसके लिए टिकट है। गुफ़ा के पास ही मेज़-कुर्सी लगा कर बैठे कर्मचारी से टिकट लेकर हम गुफ़ा में गए। गुफ़ा में भीतर जाते ही नारायण-नारायण का चिर परिचित नारदजी का स्वर सुनाई देने लगता है।

गुफ़ा में दाहिनी ओर एक के बाद एक अलग-अलग खण्डों में क्रम से लगे ज्योतिर्लिग देखें। हर ज्योतिर्लिंग पर अंग्रेज़ी में विवरण लिखा है जिसमें ज्योतिर्लिंग का नाम, स्थान और विशेषताएं बताई गई है। मुख्य ज्योतिर्लिंग के साथ छोटे आकार के शिव लिंग भी आस-पास रखे है।

चौथा ज्योतिर्लिंग है - मल्लिकार्जुन स्वामी जो आन्ध्र प्रदेश में श्रीशैलम मे स्थित है जिसकी यात्रा हम कर चुके है। शेष एक भी ज्योतिर्लिंग हमारा देखा हुआ नहीं था और यहीं पर हमने पहली बार देखा।

छठे-सातवें ज्योतिर्लिंग से गुज़रते हुए गुफ़ा दाहिनी ओर मुड़ने लगती है और इसी मोड़ पर बाईं ओर नारदजी की आदमकद मूर्ति है जहाँ से हरिजाप सुनाई दे रहा था।

गुजरात के सोमनाथ से लेकर राजस्थान, महाराष्ट्र हर जगह के ज्योतिर्लिंग देखें पर सबसे आकर्षक लगा अमरनाथ का हिम ज्योतिर्लिंग। सफ़ेद जगमगाता हुआ बर्फ़ का बना शिवलिंग।

हालांकि दोपहर बारह बजे का समय था और गर्मी का मौसम फिर भी इस हिम शिवलिंग के आसपास भी पानी की एक बूँद भी नज़र नहीं आई जिससे बर्फ़ के पिघलने का अहसास हो। हमने छुआ पर बर्फ़ पर अधिक देर हाथ नहीं रख पाए। ज्योतिर्लिंग यात्रा की समाप्ति पर बाईं ओर शिव की आदमकद मूर्ति है।

इस गुफ़ा में इलेक्ट्रानिक व्यवस्था अच्छी है। गुफ़ा में नीम अँधेरा है और ज्योतिर्लिंगों पर तेज़ रोशनी। नारदमुनी के हरिजाप के बारे में हम बता ही चुके है। शिव की मूर्ति का दाहिनी हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। यह हाथ धीरे-र्धीरे ऊपर उठता है और नीचे आकर बीच में रूकता है फिर ऊपर उठने लगता है जिससे यदि कुछ सेकेण्डों के लिए आप मूर्ति के सामने खड़े हो जाए तो लगेगा कि शिवजी आपको आशीर्वाद दे रहे है।

गुफ़ा से बाहर आते ही द्वार पर ही गणपति की मूर्ति है और वहीं कैलाश पर्वत पर विराजमान है शिव। आगे बढने पर छोटे से कलश में रखी है गरम भस्म जिसका हमनें टीका किया फिर आ गए परिसर में।

परिसर में दर्शकों की कतारों के कटघरें में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पीतल के छोटे कलश लगे है। जैसा कि सभी जानते है इस तरह की कतारें यू टर्न में होती है और पास-पास लगे यू टर्नों में लगातार लगे यह कलश बहुत सुन्दर लग रहे थे। ऐसा मैनें पहली बार इसी मन्दिर में देखा।

यहाँ भी भीड़ अधिक नहीं थी और हम जल्दी ही दर्शन के लिए आगे बढ गए। दर्शन के लिए रखी थी शिवजी की चाँदी की मूर्ति। दर्शन के बाद बाहर किनारे पूजा के लिए शिवलिंग स्थापित है। जैसा कि चलन है शिवजी की मूर्ति के दर्शन किए जाते है और पूजा शिवलिंग की होती है।

आभिषेक के लिए वहीं पर गिलासों में दूध बेचा जा रहा था। एक गिलास दूध की कीमत दस रूपए थी। हमनें भी दूध लेकर शिवलिग का अभिषेक कर पूजा की।

पूजा के बाद बाहर आने के लिए रास्ता दूसरी ओर से है जहाँ छोटा सा बाज़ार लगा है जैसा कि आमतौर पर मन्दिरों के पास होता है। बाज़ार की रौनक देखते हुए हम बाहर निकले और दोपहर के भोजन के लिए चल पढे।

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बैंग्लूर का लाल बाग़

पिछले सप्ताह मैं बैंग्लूर और मैसूर घूमने गई थी। वहाँ लिए गए कुछ चित्र और जानकारी आपसे बाँटना चाहती हूँ।

सबसे पहले हम बैंग्लूर पहुँचे। वहाँ भी गर्मी वैसी ही रही जैसी हैदराबाद में थी, 38 डिगरी के आसपास। पहला अनुभव यही हुआ कि बैंग्लूर का मौसम भी बिगड़ गया है। सुना था यहाँ धूप तेज़ नहीं होती और हमेशा सुहावना मौसम रहता है, तो यह भ्रम टूट गया।

दूसरा भ्रम टूटा बैंग्लूर की सड़को का। सुना था बहुत चौड़ी सड़के है पर इतना ट्रैफिक की सड़के भी संकरी लगने लगी। कोई भी सिग्नल हम बिना रूके पार नहीं कर पाए।

शाम के समय हम पहुँचे लाल बाग़ जो एक व्यस्त सड़क पर है। भीतर पहुँचते ही हमने पहली यह तस्वीर ली जिसे देख कर आपको पता चलेगा कि हम पाँच बजने में पाँच मिनट कम रहने पर वहाँ पहुँचे।

पहली नज़र में तो लगा ही नहीं कि यह वास्तविक घड़ी है। फिर एचएमटी के बैनर के सामने इसका गहरा लाल सेकेण्ड का काँटा घूमते देखा। लकड़ी की तरह लगने वाले दोनों काँटे समय बता रहे थे। काँटों पर किसी तरह का फ्रेम नहीं।

हरियाली पर यह घड़ी बराबर चल रही थी और हरियाली देख कर लग रहा था कि यहाँ नियमित पानी दिया जाता है। किस धातु के बने है यह वाटर प्रूफ काँटे और हरियाली के नीचे दबी मशीन कैसे जुड़ी है इसकी तकनीकी जानकारी देने वाला वहाँ कोई नहीं था। किसी बोर्ड पर भी नहीं लिखा था। पास से भी इसे नहीं देखा जा सकता। एक निश्चित दूरी पर बाड़ बनी है इसी से इसे छू कर भी कुछ जाना नहीं जा सका।

240 एकड़ में फैले इस बाग़ में जगह-जगह फव्वारे लगे है। इस फव्वारे के पीछे दोनों ओर है बोनसई गार्डन जिसमें ऊँचे-ऊँचे पेड़ निश्चित दूरी पर लगे है जिससे यह सैर करने वाले बगीचे के साथ वनस्पति शास्त्र की जानकारी देने वाला उद्यान भी लगा। निश्चित रूप से यह वैज्ञानिक सलाह पर बना है।

इसके दाहिनी ओर लोटस गार्डन है यानि कमल की बहार। यहाँ एक बात हम आपको बता दे कि बाग़ कहने से जिस तरह फूलों के बहार की हम कल्पना करते है वो रंग-बिरंगी बहार यहाँ नज़र नहीं आई पर चारों ओर हरियाली थी।

आगे बढने पर एक और वैज्ञानिक दृष्टि। ग्रीन हाउज़ का नाम सुना होगा जिसकी दीवारें और छत काँच से बने होते है जिससे छन कर आने वाले प्रकाश में पौधों पर विभिन्न शोध किए जाते है।

ऐसा ही यह काँच का गलियारा है पर इसमें पौधे नहीं है। बीच में से गुज़र भी नहीं सकते।

यह बाग़ इतना लंबा चौड़ा है कि इसमें कुछ-कुछ सड़कों जैसा भी है। दोनों किनारों पर हरियाली, ऊँचे पेड़ और बीच में सड़क। शायद इसीलिए इस सड़क का नाम है ठंडी सड़क।

मैं चौंक गई यहाँ आ कर। बोर्ड पर ऊपर कन्नड़ भाषा में और नीचे अंग्रेज़ी में लिखा है ठंडी सड़क। शब्द हिन्दी का है पर हिन्दी में लिखा नहीं है। शायद इस जगह के लिए हिन्दी में ही उपयुक्त शब्द है।

मुझे अचानक यहाँ याद आ गया कि 14 वीं सदी में कर्नाटक में सरकारी काम-काज हिन्दी में होता था। आज भी हिन्दी लोकप्रिय है और कुछ ऐसे निशां हिन्दी प्रेम की गवाही देते है।

सबसे पीछे बीच में हरियाली समाप्त होती है और पत्थरों का टीला है जहाँ सबसे ऊपर चार पत्थर है। माना जाता है यह पत्थर सबसे पुराने पत्थरों में से है। इस टीले से नीचे पूरा शहर नज़र आता है।

बाग़ में बीच में आइसक्रीम, चिप्स जैसी चीज़ें भी खरीद कर खाई जा सकती है। यानि एक लम्बा समय आप यहाँ आराम से गुज़ार सकते है।

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नवरात्र व्रत फलाहार

नवरात्र में कुछ लोग केवल फलाहार लेते है। फलाहार में शामिल है फल और दूध। सबसे अच्छा फलाहार है - केला और दूध

दूध में इतने पौष्टिक तत्व होते है कि दूध को संपूर्ण आहार माना जाता है। इसी तरह केले में भी इतने पौष्टिक तत्व होते है कि केले को भी संपूर्ण आहार माना जाता है। इसीलिए केले और दूध का मिश्रण स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।

प्राकृतिक शक्कर केले और दूध दोनों में होती है इसीलिए केले का छिलका निकाल कर दूध में केले को मसल कर खाया जा सकता है, शक्कर या कुछ और मिलाने की आवश्यकता ही नहीं होती।

केले में नैसर्गिक या प्राकृतिक शक्कर अधिक होती है। इसीलिए मधुमेह (डायाबिटिस) के रोगियो को इससे दूर रखा जाता है।

इसमें खनिज लवण जैसे कैल्शियम, मैग्निशियम, पोटैशियम, फास्फोरस, ताँबा, लोहा बहुत होते है। कार्बोहाइड्रेड 22% प्रोटीन 2% वसा 1% विटामिन ए और बी 03% विटामिन सी 1% होते है।

दूध में प्रोटीन 3% वसा 4% कार्बोहाइड्रेड 5% विटामिन और लवण लगभग 1% होते है।

वैसे हिन्दु संस्कृति में मांगलिक कार्यों में दूध विशेषकर गाय का दूध और केला अनिवार्य होते है। केले के पत्ते और तने का उपयोग तोरण लगाने और मंडप बनाने में किया जाता है। भोग में भी केला रखा जाता है।

प्रसाद भी केले के पत्ते में ग्रहण किया जाता है। यहाँ तक कि भोजन भी केले के पत्ते में किया जाता है। इसीलिए व्रत में भी सबसे उत्तम फल केला माना जाता है।

सामान्य नाम केला है। यहाँ हैदराबाद में इसे मौज़ कहा जाता है। इसका कोई और नाम मुझे ज्ञात नहीं है। इसका वैज्ञानिक नाम मूसा पारादिसिआका लिनिअस है।

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