Archive for March, 2008

कवि का नाम मैं भूल रही हूँ

हमारे समाज में कुछ ग़ैर फ़िल्मी गीत भी बहुत लोकप्रिय हुए है।

स्कूल-कालेजों के समारोहों से लेकर देश के विभिन्न समारोहों में ये गीत प्रस्तुत किए गए। इतना ही नहीं आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी इनका प्रसारण होता रहता है।

एक ऐसा ही गीत आज मैं प्रस्तुत कर रही हूँ जो मूल रूप से अंग्रेज़ी भाषा का गीत है जिसका हिन्दी में अनुवाद गिरिजा कुमार माथुर ने किया है। प्रस्तुत है गीत -

हम होंगे कामयाब

हम होंगे कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन

हम चलेंगे साथ-साथ डाल हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
मन में है विश्वास पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन

होगी शान्ति चारों ओर
होगी शान्ति चारों ओर एक दिन
मन में है विश्वास पूरा है विश्वास
होगी शान्ति चारों ओर एक दिन

नहीं डर किसी का आज
नहीं भय किसी का आज के दिन
मन में है विश्वास पूरा है विश्वास
नहीं डर किसी का आज के दिन

इस गीत को लिखने वाले अंग्रेज़ी कवि का नाम मैं तो भूल रही हूँ अगर आप जानते है तो बताइए…

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होली की रात

आप सबको होली मुबारक !

इस अवसर पर प्रस्तुत है जयशंकर प्रसाद का एक बहुत ही कम चर्चित गीत जिसे स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक शायद ही किसी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।

यहाँ तक कि उनकी काव्य पुस्तकों में भी यह गीत नहीं मिलता। कुछ ही दिन पहले इस गीत पर मेरी नज़र पड़ी तो मैनें सोचा कि होली पर गीतों की पुरवाई में इसका आनन्द लेंगे। प्रस्तुत है गीत -

होली की रात

बरसते हो तारों के फूल
छिपे तुम नील पटि में कौन
उड़ रही है सौरभ की धूल
कोकिला कैसे रहती मौन ?

चाँदनी धुली हुई है आज
बिछलते है तितली के पँख
संभल कर मिलकर बजते साज़
मधुर उठती है तान असंख

तरल हीरक लहराता शान्त
सरल आशा सा पूरित ताल
सिताबी छिड़क रहा विधु कान्त
बिछा है सेज कमलिनी जाल

पिये गाते मनमाने गीत
टोलियों मधुपों की अविराम
चली आती कर रही अभीत
कुमुद पर बरजोरी विश्राम

उड़ा दो मत गुलाल सी हाय
अरे अभिलाषाओं की धूल
और ही रंग नहीं लग लाय
मधुर मंजरियां जावें झूल

विश्व में ऐसा शीतल खेल
ह्रदय में जलन रहे क्या हात
स्नेह से जलती ज्वाला झेल
बना ली हाँ होली की रात

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मीरा सी होली खेलो फागुन आयो रे !

कृष्ण कन्हैया की चर्चा के बिना होली की चर्चा अधूरी है और जब बात चले बँसीबजैया की तो बरबस मीरा का नाम आ ही जाता है।

होली में बिना सुर और साज के अंतरात्मा की झंकार पर मीरा के रोम रोम से छत्तीसों राग निकलते है। संतोष की केसर घोल कर प्रेम की पिचकारी से खेली जाने वाली होली का आप भी आनन्द लीजिए -

फागुन के दिन चार होली खेल मना रे

बिन करताल पखावज बाजे अणहद की झंकार रे ।
बिन सुर राग छत्तीसूं गावै रोम रोम रणकार रे ॥

सील संतोख की केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे ।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर बरसत रंग अपार रे ॥

घट के सब पट खोल दिए है लोक लाज सब डार रे ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कंवल बलिहार रे ॥

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