Archive for February, 2008

रजनीबाला

आज भूले-बिसरे गीतों की श्रृंखला में प्रस्तुत है एक ऐसा गीत जिसे मैनें छठी कक्षा में पढा था।

रामकुमार वर्मा के इस गीत में रात्रि का वर्णन है। शायद इसे पढ कर आपको भी बचपन के वो लम्हें याद आ जाए -

रजनीबाला

इस सोते संसार बीच जग कर सज कर रजनीबाले
कहाँ बेचने ले जाती हो ये गजरे तारों वाले

मोल करेगा कौन सो रही है उत्सुक आँखे सारी
मत कुम्हलाने दो सूनेपन में अपनी निधियां न्यारी

निर्झर के निर्मल जल में ये गजरे हिला हिला धोना
लहर लहर कर यदि चूमे तो किंचित विचलित मत होना

होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित लहरों ही में लहराना
लो मेरे तारों के गजरे - निर्झर स्वर में ये गाना

यदि प्रभात तक कोई आकर तुमसे हाय न मोल करें
तो फूलों पर ओस रूप में बिखरा देना सब गजरे

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गुम होती काकतीय कला के कुछ चित्र

दक्षिण भारत की लोकप्रिय काकतीय कला अब गुम होती जा रही है। आन्ध्र प्रदेश में कुछ भवन इस कला के बेहतरीन उदाहरण है जिनमें से एक है वरंगल ज़िले के हनमकोण्डा में स्थित सहस्त्र स्तंभ मंदिर

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इसे आम भाषा में हज़ार खंबों का मंदिर भी कहते है।

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वैसे इसमें हज़ार स्तंभ कभी नहीं रहे।

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जब निर्माण किया गया था तब भी 950 से कुछ अधिक ही खंबे थे।

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पत्थरों पर कंगूरों की आकृती से शिल्पकारी ही इस कला का आकर्षण है।

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अब यहां 50 से कुछ अधिक ही स्तूप (स्तम्भ) रह गए है। शेष सभी खंबे उखड़ गए है जिन्हें पास के मैदानी भाग में रखा गया है। पुरातत्व विभाग इसका संरक्षण कर रहा है।

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ढाई आखर प्रेम का

वसन्त ॠतु अपने साथ प्यार की ॠत लाती है। सदियो से हमारी संस्कृति में प्रेम के गीत गाए जाते रहे है।

भारतीय संस्कृति ने ही प्रेम की गहराई को समझा और समझाया है। जिस देश में प्रेम का प्रतीक ताजमहल है वहीं आज प्यार का प्रतीक केवल लाल गुलाब रह गया है।

ऐसे में मुझे प्रेम की परिभाषाएं देते दोहे याद आ रहे है -

कबीर ने कहा है -

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोहि रूचैं, शीश देई लेय जाय ॥

प्रेम भाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय ।
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय ॥

ये तो घर है प्रेम का, ख़ाला का घर नाहि ।
सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर माहि ॥

प्रेम प्याला जो पिए, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥

पोथी पढी-पढी जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का पढै सो पंडित होय ॥

रहीम ने कहा है -

रहिमन प्रीत न कीजिए, जस खीरा ने कीन ।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फाँके तीन ॥

रहिमन मारग प्रेम का, मर्मत हीत मझाव ।
जो डिरिहै ते फिर कहूँ, नहिं धरने को पाँव ॥

प्रेम अहेरी साजि कै, बाँध परियौ रस तान ।
मन मृग ज्यौं रीझै नहिं, तोहि नैन के बान ॥

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय ।
टूटे से फिर न मिले, मिलै गाँठ पड़ जाय ॥

और रसखान ने कहा है -

प्रेम-प्रेम सब कहत, प्रेम न जानत कोई ।
जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोई ॥

अति सूक्ष्म कोमल अतिहि अति पतराउ अति दूर ।
प्रेम कठिन सब ते सदा नित इकरस भरपूर ॥

प्रेम अगम अनुपम अमित सागर सरिस बखान ।
जो आवत एहि ढिग बहुरि जात नाहिं रसखान ॥

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