आज भूले-बिसरे गीतों की श्रृंखला में प्रस्तुत है एक ऐसा गीत जिसे मैनें छठी कक्षा में पढा था।
रामकुमार वर्मा के इस गीत में रात्रि का वर्णन है। शायद इसे पढ कर आपको भी बचपन के वो लम्हें याद आ जाए -
रजनीबाला
इस सोते संसार बीच जग कर सज कर रजनीबाले
कहाँ बेचने ले जाती हो ये गजरे तारों वाले
मोल करेगा कौन सो रही है उत्सुक आँखे सारी
मत कुम्हलाने दो सूनेपन में अपनी निधियां न्यारी
निर्झर के निर्मल जल में ये गजरे हिला हिला धोना
लहर लहर कर यदि चूमे तो किंचित विचलित मत होना
होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित लहरों ही में लहराना
लो मेरे तारों के गजरे - निर्झर स्वर में ये गाना
यदि प्रभात तक कोई आकर तुमसे हाय न मोल करें
तो फूलों पर ओस रूप में बिखरा देना सब गजरे