Archive for January, 2008

पुष्प की अभिलाषा

बापू की पुण्य स्मृति और शहीद दिवस पर आज मुझे याद आ रही है माखनलाल चतुर्वेदी की एक कविता जिसे मैनें शायद पांचवीं या छठी कक्षा में पढा था।

इसे विविध भारती ने गीत के रूप में ढाला है जो पहले कभी-कभार सवेरे देशगान के रूप में सुनवाया जाता था, मगर अब इसे भी सुने काफ़ी समय बीत गया है।

यहां प्रस्तुत है ये कविता -

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं
चाह नहीं सम्राटों के शव पर है हरि डाला जाऊं
चाह नहीं देवों के शिर पर चढूं भाग्य पर इठलाऊं

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृ भूमि पर शीश चढाने जिस पथ पर जावें वीर अनेक

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सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा

गीतों की पुरवाई में गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है मोहम्मद इक़बाल का लिखा क़ौमी तराना -

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं उसकी ये गुलसितां हमारा

गुरबत में हो अगर हम रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा

पर्वत वो सबसे ऊँचा हमसाया आसमां का
वो संतरी हमारा वो पासबां हमारा

गोदी में खेलती है जिसकी हज़ारों नदियां
गुलशन है जिसके दम से रश्क-ए-जिनां हमारा

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी है हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा

आप सबको गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं !

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पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे

ये पंक्ति पढ कर शायद आपमें से बहुतों के मुख से अगली पंक्ति ये निकल आए -

और हम नाचे बिन घुँघरू के

लेकिन नहीं, मैं ऐसा कुछ लिखने नहीं जा रही हूं। मैं तो मूल पद प्रस्तुत करना चाहती हूं। मीरा का ये पद मुझे बहुत प्रिय है क्योंकि अपने जीवन में सीखी गई ये पहली रचना है।

बचपन में स्कूल में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखते हुए जो पहला गीत हमें सिखाया गया वो यही था। कृष्ण भक्ति में डूबा कुल पाँच पंक्तियों का ये पद पाँच मिनट में आपको समझा देता है कि जीवन में किन कठिनाइयों को झेलते हुए मीरा भक्ति सागर में डूबती गई थी।

आप भी आनन्द लीजिए इस रचना का -

पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे ।
मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे ।
लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे ।
विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे ।
'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे ।

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