बापू की पुण्य स्मृति और शहीद दिवस पर आज मुझे याद आ रही है माखनलाल चतुर्वेदी की एक कविता जिसे मैनें शायद पांचवीं या छठी कक्षा में पढा था।
इसे विविध भारती ने गीत के रूप में ढाला है जो पहले कभी-कभार सवेरे देशगान के रूप में सुनवाया जाता था, मगर अब इसे भी सुने काफ़ी समय बीत गया है।
यहां प्रस्तुत है ये कविता -
पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं
चाह नहीं सम्राटों के शव पर है हरि डाला जाऊं
चाह नहीं देवों के शिर पर चढूं भाग्य पर इठलाऊं
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृ भूमि पर शीश चढाने जिस पथ पर जावें वीर अनेक