Archive for October, 2007

भक्ति का निराला रूप

यह समय है त्यौहारों का, पूजा-पाठ का। अभी रमज़ान भी बीता और एक महीने के बाद क्रिसमस की धूम शुरू हो जाएगी।

समाज के सभी वर्गों के लिए यह समय है परम्परागत भक्ति और उल्लास का। कहीं दिखावा भी है तो कहीं सिर्फ़ लोकोचार है। कुछ तो ऐसे भी है जो अपने आप को इन सबसे दूर रखना चाहते है।

ऐसे में बहुत समय पहले पढी गई सुभद्राकुमारी चौहान की एक कविता याद आ रही है जो हो सकता है मेरे साथ-साथ आपका भी भूला-बिसरा गीत हो।

प्रस्तुत है यह रचना -

ठुकरा दो या प्यार करो

देव तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते है
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई तरह की लाते है।

धूम-धाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते है
मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएं लाकर तुम्हें चढाते है।

मैं ही हूं ग़रीबनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लाई
फ़िर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आई।

धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नही
हाय गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं।

कैसे करूं कीर्तन मेरे स्वर में माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं।

नहीं दान है नही दक्षिणा खाली हाथ चली आई
पूजा की विधि नहीं जानती फिर भी नाथ चली आई।

पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
दान दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो।

मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी ह्रदय दिखाने आई हूं
जो कुछ है वो यही पास है इसे चढाने आई हूं।

चरणों पर अर्पित है इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो।

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झंडा ऊंचा रहे हमारा

यह स्वाधीनता संग्राम की डेढ सौवीं वर्षगांठ का समय है। इस अवसर पर बहुत सारे देश भक्ति गीत याद आते है। एक गीत ऐसा है जिससे मेरा अटूट संबंध है। यह श्यामलाल गुप्त पार्षद का लिखा गीत है।

इस गीत को स्वाधीनता संग्राम के आंदोलन के दौरान गाया जाता था। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके दो पद निकाल कर और एकाध पंक्ति में शब्दों का हल्का सा फेरबदल कर झंडा वंदन के रूप में गाया जाने लगा।

मेरा इस झंडा वंदन से अटूट संबंध तब बना जब मैं छठी कक्षा में पढती थी। हमारे विद्यालय में छठी कक्षा से प्रार्थना समूह बनाए जाते थे। ये समूह रोज़ सुबह प्रार्थना गाते थे जिसका तरीका ये था कि समूह एक पंक्ति गाता और सभी छात्र उसे दोहराते। छठी कक्षा में मेरा भी चयन प्रार्थना समूह के लिए हुआ।

छठी से दसवीं कक्षा तक पांच सालों तक सप्ताह में कम से कम एक बार हमारा समूह प्रार्थना गाता। इसी से अन्य कार्यक्रमों में भी भाग लेने का अवसर मिलता। हमारा समूह झंडा वंदन बहुत अच्छा गाता था जिससे लगातार 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा वंदन के रूप में हम ये गीत गाते रहे।

आज मैं आपके लिए झंडा वंदन के रूप में इस रचना को प्रस्तुत कर रही हूं -

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

सदा शक्ति बरसाने वाला
प्रेम सुधा सरसाने वाला
वीरों को हरषाने वाला
मातृ-भूमि का तन-मन सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

इस झंडे के नीचे निर्भय
है स्वराज का सुंदर निर्णय
बोलो भारत माता की जय
स्वतंत्रता है ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

आओ प्यारे वीरों आओ
देश धर्म पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिलकर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

इसकी शान न जाने पाए
चाहे जान भले ही जाए
विश्व विजय करके दिखलाए
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

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पहले पढा फिर समझा अब अनुभव किया

मैं आज एक ऐसी कविता की चर्चा कर रही हूं जिसे हममें से बहुतों ने बचपन में ही पढा है। यह कविता है ग्रामश्री और रचयिता है प्रसिद्ध हिन्दी कवि सुमित्रानन्दन पंत।

श्री का अर्थ समृद्धि है। कवि ने एक समृद्ध गांव बताया है। गांव की समृद्धि का अर्थ होता है लहलहाते खेत और भरे-भरे खलिहान।

बचपन में इस कविता को पढते समय समझाया जाता है कि भारत कृषि प्रधान देश है। देश की आत्मा गांवों में बसती है। हमने भी सिर्फ़ यही समझा। जब एम ए में साहित्य का अध्ययन करने लगे तब परिचित हुए पंत के प्रकृति चित्रण की दक्षता से।

आज कृषि से जुड़ी संस्थान में काम करने लगे तो कविता का एक-एक अक्षर ना सिर्फ़ जानने लगे बल्कि अनुभव भी करने लगे। रोज़ की आदत सी हो गई है दोपहर के भोजन के बाद खुली हवा में कुछ देर चहलकदमी करने की और यह सैर कार्यालय में पीछे शोध किए जा रहे खेतों में की जाती है। कार्यालय भी कृषि विश्वविद्यालय के परिसर में है।

मुझ जैसे बहुत ही कम लोग हैं जिन्हें ऐसे हरे-हरे वातावरण में रहने का अवसर मिलता है। ऐसे समय इस कविता की याद आना स्वाभाविक है। तो प्रस्तुत है ग्रामश्री -

फैली खेतों में दूर तलक मखमल की कोमल हरियाली
लिपटी जिससे रवि की किरणें चांदी की सी उजली जाली।

रोमांचित सी लगती वसुधा आई जौ-गेहूं में बाली
अरहर सनई की सोने की किंकिंणिया है शोभाशाली।

उड़ती भीनी तैलाक्त गंध फूली सरसों पीली पीली
लो हरित धरा से झांक रही नीलम की कलि तीसी नीली।

रंग-रंग के फूलों में रिलमिल हंस रही संखिया मटर खड़ी
मखमली पेटियों सी लटकी छीमियां छिपाएं बीज लड़ी।

अब रजत स्वर्ण मंजरियों से लद गई आम्र तरू की डाली
झर रहे ढांक पीपल के दल हो उठी कोकिला मतवाली।

महके कटहल मुकुलित जामुन जंगल में झरबेरी झूली
फूले आड़ू नींबू दाड़िम आलू गोभी बैंगन मूली।

पीले मीठे अमरूदों में अब लाल लाल चित्तियां पड़ी
पक गए सुनहरे मधुर बेर अंवली से तरू की डाल जड़ी।

लहलह पालक महमह धनिया लौकी औ सेम फली फैली
मखमली टमाटर हुए लाल मिर्चों की बड़ी हरी थैली।

गंजी को मार गया पाला अरहर के फूलों को झुलसा
हांका करती दिन भर बन्दर अब मालिन की लड़की तुलसा।

बालाएं गजरा काट काट कुछ कह गुपचुप हंसती किनकिन
चांदी की सी घण्टियां तरल बजती रहती रह-रह खिन खिन।

बगिया के छोटे पेड़ों पर सुंदर लगते छोटे छाजन
सुंदर गेहूं की बालों पर मोती के दानों से हिम किन।

प्रातः ओझल हो जाता जग भू पर आता ज्यों उतर गगन
सुंदर लगते फिर कुहरे से उठते से खेत बाग़ गृह वन।

लटके तरूओं पर विहग नीड़ वनचर लड़को को हुए ज्ञात
रेखा छवि विरल टहनियों की ठूंठे तरूओं से नग्न गात।

आंगन में दौड़ रहे पत्ते घूमती भंवर सी शिशिर वात
बदली छटने पर लगती प्रिय ॠतुमती धरित्री सद्य-स्नात।

हंसमुख हरियाली हिम आतप सुख से अलसाए से सोए
भीगी अंधियाली में निशि की तारक स्वप्नों में से खोए।

मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम जिस पर नीलम नभ आच्छादन
निरूपम हिमान्त में स्निग्ध शान्त निज शोभा से हरता न-नमज।

है न सुंदर कविता ! अगर अब भी अनुभव न हो रहा हो तो इस समय शहर की सीमाओं पर आप चले जाइए, ये कविता आपको पसरी मिलेगी।

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