बात उन दिनों की है जब हम सातवीं क्क्षा में पढते थे। पाठ्यक्रम में मैथिलीशरण गुप्त का एक गीत था। उस गीत के बारे में यह कहा जाता था कि यह गीत परीक्षा में ज़रूर पूछा जाता है।
उन दिनों सातवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा होती थी जो छात्र जीवन की पहली बोर्ड परीक्षा होती थी। इसलिए उस कक्षा में हर बात बहुत गंभीरता से ली जाती थी। परीक्षा में गीत से संबंधित कुछ भी पूछा जाए ज़रूरी तो ये था कि पूरा गीत या कविता याद हो। सो शुरू हो गया रटना। पूरा साल कविता रटते रहे। परीक्षा में पूछा भी गया और जब सब लिख दिया तब शान्ति मिली।
इसी कविता को कालेज के दिनों में पढा तो लगा कि कवि ने कितना सुंदर प्रकृति चित्रण किया है। बार-बार पढते गए और आनन्द लेते गए। तब लगा कि परीक्षा का क्या भय होता था कि कविताओं का आनन्द लेना छोड़ कर उन्हें रटना पढता था।
पूरी कविता तो मुझे याद नहीं लेकिन जो पंक्तियां बहुत अच्छी लगी वो याद रह गई -
चारू चन्द्र की चंचल किरणें
खेल रही है जल थल में
सुभग्र चांदनी बिछी हुई है
अवनि और अम्बर तल में
पुलक प्रकट करती है धरती
हरित जिसके होने पर
रवि बटोर लेता है उसको
सदा सवेरा होने पर
कितना सुहावना चित्र है कि चन्द्रमा की किरणें जल में यानि नदी, समुद्र में और थल यानि धरती पर बिखरी है। बादल कभी चन्द्रमा को पूरा तो कभी कुछ भाग ढक लेते है जिससे किरणें छोटी, बड़ी, आगे, पीछे होने लगती है। इसी से किरणें चंचल है और लगता है जैसे खेल रही है। इस तरह से सफेद दूधिया चांदनी धरती से लेकर आकाश तक फैली है।
धरती भी अपने हरे होने यानि हरियाली से ख़ुश होती है। ख़ुशी से उसके आंसू छलक रहे है जिसे हम ओस कहते है। सुबह होते ही ओस ग़ायब हो जाती है ऐसे जैसे रवि या सूरज ने इनको बटोर लिया है।
इतनी सुंदर कविता जिसको पढ कर, सुन कर कितना आनन्द आता है उसे परीक्षा के भूत के डर से रटा जाता है। उफ़्फ़फ़ ! क्या है हमारी शिक्षा पद्धति।