Archive for September, 2007

मेरा पहला प्रकृति गीत

बात उन दिनों की है जब हम सातवीं क्क्षा में पढते थे। पाठ्यक्रम में मैथिलीशरण गुप्त का एक गीत था। उस गीत के बारे में यह कहा जाता था कि यह गीत परीक्षा में ज़रूर पूछा जाता है।

उन दिनों सातवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा होती थी जो छात्र जीवन की पहली बोर्ड परीक्षा होती थी। इसलिए उस कक्षा में हर बात बहुत गंभीरता से ली जाती थी। परीक्षा में गीत से संबंधित कुछ भी पूछा जाए ज़रूरी तो ये था कि पूरा गीत या कविता याद हो। सो शुरू हो गया रटना। पूरा साल कविता रटते रहे। परीक्षा में पूछा भी गया और जब सब लिख दिया तब शान्ति मिली।

इसी कविता को कालेज के दिनों में पढा तो लगा कि कवि ने कितना सुंदर प्रकृति चित्रण किया है। बार-बार पढते गए और आनन्द लेते गए। तब लगा कि परीक्षा का क्या भय होता था कि कविताओं का आनन्द लेना छोड़ कर उन्हें रटना पढता था।

पूरी कविता तो मुझे याद नहीं लेकिन जो पंक्तियां बहुत अच्छी लगी वो याद रह गई -

चारू चन्द्र की चंचल किरणें
खेल रही है जल थल में
सुभग्र चांदनी बिछी हुई है
अवनि और अम्बर तल में

पुलक प्रकट करती है धरती
हरित जिसके होने पर
रवि बटोर लेता है उसको
सदा सवेरा होने पर

कितना सुहावना चित्र है कि चन्द्रमा की किरणें जल में यानि नदी, समुद्र में और थल यानि धरती पर बिखरी है। बादल कभी चन्द्रमा को पूरा तो कभी कुछ भाग ढक लेते है जिससे किरणें छोटी, बड़ी, आगे, पीछे होने लगती है। इसी से किरणें चंचल है और लगता है जैसे खेल रही है। इस तरह से सफेद दूधिया चांदनी धरती से लेकर आकाश तक फैली है।

धरती भी अपने हरे होने यानि हरियाली से ख़ुश होती है। ख़ुशी से उसके आंसू छलक रहे है जिसे हम ओस कहते है। सुबह होते ही ओस ग़ायब हो जाती है ऐसे जैसे रवि या सूरज ने इनको बटोर लिया है।

इतनी सुंदर कविता जिसको पढ कर, सुन कर कितना आनन्द आता है उसे परीक्षा के भूत के डर से रटा जाता है। उफ़्फ़फ़ ! क्या है हमारी शिक्षा पद्धति।

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प्रसाद की ऊषा

आप सोच रहे होंगें ये प्रसाद कौन है ? और कौन है प्रसाद की ये ऊषा ?

तो प्रसाद है हिन्दी के जाने-माने साहित्यकार जय शंकर प्रसाद और ऊषा है प्रकृति बाला ।

जिसने भी जयशंकर प्रसाद का साहित्य पढा है विशेषकर कविताएं वे जानते है कि किस तरह से प्रसाद ने प्रकृति को मानव के विभिन्न रूपों और कार्यों में देखा है। एक ऐसा ही रूप है प्रकृति का ऊषा ।

प्रसाद की कल्पना में ऊषा एक लड़की है जो आकाश जैसे विशाल पनघट पर तारों के घड़ों को पानी में डुबो रही है। बात सिर्फ़ इतनी है कि सुबह हो गई है-

बीती विभावरी जाग री !
अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट ऊषा नागरी ।

खग कुल-कुल सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा
लो यह लतिका भी भर लाई
मधु मुकुल नवल रस गागरी ।

अधरों में राग अमंद पिये
अलको में मलयज बंद किये
तू अब तक सोई है आली
आंखों में भरे विहाग री ।

अब ऊषा का सौंदर्य देखिए -

वह हौले-हौले डोल रही है लगता है हवा से उसका आंचल लहरा रहा है जिसकी सरसराहट सुनाई दे रही है यानि पक्षी चहचहा रहे हैं।

लो साथ में एक और बाला लतिका भी रस की गगरी भर लाई । ये रस छलक रहा है जैसे उसके अधरों से राग निकल रहा हो यानि उनमें मधुर रस भर आने से कलियां डोल रही है जैसे बालों में हवा कैद हो ।

है न सुंदर प्रसाद की ऊषा !

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अक्षर गीत

शिक्षा की संगीतमय शुरूवात !

शिक्षा की शुरूवात पहली कक्षा से होती है । शुरूवात में होता क्या है ? वर्णमाला के अक्षर, कविता, कहानी, कुछ देर खेलना, कुछ देर सोना और कुछ खाना । अब तीन घण्टे में और हो भी क्या सकता है ? ऐसे में अगर वर्णमाला के अक्षर और कविता को मिला दिया जाए तो कैसा रहेगा ? बहुत मज़ा आएगा । यह मेरा अनुभव है ।

हुआ यूं कि जब हम पहली कक्षा में पढते थे तब हमारी अध्यापिका थी विमला दत्त । उन दिनों हैदराबाद में बच्चों के लिए एक पुस्तक आई थी - अक्षर गीत । इसमें वर्णमाला के हर अक्षर के लिए चार पंक्तियों की एक कविता थी और उसी के अनुसार रंगीन चित्र बने थे । अध्यापिका जी ने प्रधान अध्यापिका जी से इस पुस्तक के उपयोग की अनुमति ली और शुरू हो गई हमारी शिक्षा की संगीतमय शुरूवात यानि हम कविताओं से वर्णमाला सीखने लगे । कैसे ? ऐसे…

अ से

अहा ! अनार बड़ा बढिया है
खा लो इसको भाई
देखो अभी बगीचे से
लेकर मुनिया आई

एक पंक्ति अध्यापिका जी गातीं फिर हम सब बच्चे दोहराते । फिर वही पंक्ति अध्यापिका जी अभिनय के साथ गातीं फिर हम सब बच्चे दोहराते। इस तरह झूम-झूम कर गाने लगते । आवाज़े तेज़ होती जाती, शोर बढने लगता, नतीजा ये होता कि शिकायतें होती और चपरासी दौड़ कर हमारी कक्षा की ओर आते । फिर हम सब धीरे-धीरे गाने लगते । फिर धीरे-धीरे मूड में आ जाते और झूम-झूम कर गाने लगते -

आ से

आम रसीले झांक रहे है
हरे-हरे इन पत्तों से

अरे नही ! हम पूरी वर्णमाला गा कर आपको नही सुना रहे । हम तो बस इतना बता रहे थे कि हमारी शिक्षा की शुरुवात संगीतमय रही । अब आप ये सोच रहे होंगें कि ये सभी बातें हमें कैसे याद है ? सो बात ये है कि उसी स्कूल में बड़ी कक्षा में हमारी बहन पढा करती थी । उसी ने तो सब बताया । हमें तो बस एकाध अक्षर के गीत की एकाध पंक्ति ही याद है -

क से

कब से कोयल कूक रही है
बैठ अमवा की डाली पर

माना तो ये जाता है कि सबसे पहले अक्षर गीत आशा रानी व्होरा ने लिखे जिसके बाद दूसरे कवि भी अक्षर गीत लिखने लगे । हमने जो गीत पढे वो किसके है ये तो पता नहीं । हैदराबाद में ही यह पुस्तक पहली बार आई थी और देश के दूसरे भागों में उस समय यह पुस्तक थी या नहीं यह भी हमें पता नहीं लेकिन बाद में लगभग सभी जगह पहली कक्षा के पाठ्यक्रम में अक्षर गीत रखे गए ।

हां ! हमारी पसन्द का अक्षर गीत है -

म से

मछली जल की रानी है
जीवन उसका पानी है

क्या आपकी पसन्द का भी कोई अक्षर गीत है ?

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