पुरवाई

सावन के इस मौसम में आइए बरखा रानी का स्वागत करें !

एक गीत प्रस्तुत है। यह गीत स्कूल - कालेज में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बहुत बार प्रस्तुत  किया गया, यहाँ तक कि पुरस्कार भी जीते पर पता नहीं चल पाया है कि यह गीत किसने लिखा है। किसी ने किसी को दिया, किसी ने किसी को और कई हाथों से होते हुए गीत अच्छा लगने लगा।

आप भी आनन्द लीजिए इस बरखा गीत का जिसमें पुरूष-स्त्री के एकल स्वर के साथ कोरस भी है -

कैसे छिपाऊं मन की बात रे (स्त्री)
कूके कोयल सारी-सारी रात रे
बिजली कड़के जियरा धड़के
बैरन बरखा कर गई घात रे

काली घटा घिर आई चहुं ओर (कोरस)
बूंद-बूंद बरसे चहुं ओर
बूंद-बूंद बरसो रे  बूंद-बूंद बरसो रे 
बूंद-बूंद बरसो रे  बूंद-बूंद बरसो रे 

मोरी गगरी खाली बैल प्यासे (स्त्री)
भर गगरी अब लाऊं कहां से
ए ए ए ए ए ए ओए

मोरा खेतन सूखो जाए (पुरुष)
ओ रामा खेतन सूखो जाए

ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ (स्त्री)

झूम- झूम इठलाती गाती (कोरस)
बरखा रानी आई रे रानी बरखा आई रे 
बरखा रानी आई रे रानी बरखा आई रे 

काले-काले बादल देखो (पुरुष)
नया संदेशा लायो रे
नया संदेशा लायो रे

बंजर धरती पर अब बरखा (कोरस)
फसल उगाने आई रे
बरखा रानी आई रे रानी बरखा आई रे 
बरखा रानी आई रे रानी बरखा आई रे 

देख घटाएं काली-काली (स्त्री)
मनवा पीं को पुकारे रे
देख मयूर की चाल मनहरी
हमरा जियरा डोले रे

बंजर धरती पर अब बरखा (कोरस)
फसल उगाने आई रे
बरखा रानी आई रे रानी बरखा आई रे 
बरखा रानी आई रे रानी बरखा आई रे 

इस गीत से अगर आपको किसी कवि या शायर कि कुछ पंक्तियां याद आए तो हमसे बांटिए…

2 Comments »

  1. Shastri JC Philip said

    अन्नपूर्णा जी, बहुत सी यादे आ गईं इस कविता को पढ कर. इस चुनाव ले लिये आभार. बहुत अच्छा आरंभ है — शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

  2. anug said

    शास्त्री जी, आपकी सलाह और सहयोग से ही मैं यह चिट्ठा निकाल पाई हूं। आशा है आगे भी आपसे प्रेरणा मिलती रहेगी।

    अन्नपूर्णा

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