प्रस्तुत है मेरे भूले बिसरे गीत । आं आं आं जी नहीं इन गीतों का विविध भारती के भूले बिसरे गीतों से कोई लेना-देना नहीं है । ये मेरे बचपन के गीत है।
जी हां, बचपन - जिन्हें आप सब ने जिया है। हम सभी बचपन में चाहे किसी भी स्कूल से पढे हो सांस्क्रतिक कार्यक्रमों से ज्ररूर जुड़े रहे। छोटे से गांव की पाठशाला में भी झंडा वन्दन ज़रूर होता है ऐसे में गाए जाने वाले गीत भी सांस्क्रतिक कार्यक्रम के वर्ग में रखे जा सकते है। मुद्दा ये कि हम सभी बचपन के गीतों से जुड़े है चाहे गाया हो या केवल दर्शक की तरह सुना हो। कुछ ऐसे ही गीत मैं यहां प्रस्तुत कर रही हूं जो आधे-अधूरे है।
पहला गीत माझी गीत है -
अब मचल उठा है दरिया
और बहने लगी है नदिया
उनचास पवन डोले
झंझा की बजे बंसुरिया
ओ नैय्या पार लगा दे
ओ रे ओ माझी पार लगा दे
दूसरा गीत शायद एक लोक गीत है -
ऊंची डगर मोरा गांव
ओ नदिया नीचे बहे
तीसरा गीत ऐसा है जिसकी प्रस्तुति में मुझे बहुत मज़ा आया था -
नन्ही नन्ही नारियां
भरने चली पानियां
झूम-झूम गाएंगें
हंसते हंसते जाएगें
यह गीत शायद किसी जाने-माने क्र्ष्ण भक्त कवि का है। बहुत बड़ी रचना है। अंतरों की संख्या भी मुझे याद नहीं। इस युगल गीत की केवल यही पंक्तियां याद है -
कहां चली ओ ब्रज की बाला
सिर पर लिए गगरिया
छेड़ करों न ओ नन्द्लाला
छोड़ो मोरी डगरिया
अगर कोई इन गीतों को पूरा कर पाए या कुछ और पंक्तियां जोड़ पाए या कवि के नाम बता पायें ठीक है। और हां अगर आपको भी कोई ऐसा ही गीत याद आ रहा हो तो हमसे बाटिएं।